वागड़ में 20 दिन में 360 हिंदू सम्मेलन, सनातनियों ने दिखाई एकजुटता

भास्कर संवाददाता| डूंगरपुर वागड़ क्षेत्र के पहली बार व्यापक स्तर पर आयोजित 360 हिंदू सम्मेलनों का 20 दिवसीय महाआयोजन हुआ। बांसवाड़ा, सागवाड़ा और डूंगरपुर जिले के मंडल व बस्ती स्तर तक आयोजित इन सम्मेलनों में कुल 6 लाख 56 हजार 907 लोगों की सहभागिता दर्ज की, जो क्षेत्रीय सामाजिक जागरण की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जा रहा है 18 जनवरी से 8 फरवरी तक चले इस अभियान ने गांव-गांव, बस्ती-बस्ती और समाज के विविध वर्गों तक व्यापक संपर्क स्थापित करते हुए एक संगठित सामाजिक चेतना का वातावरण निर्मित किया। यह महाआयोजन संघ के शताब्दी वर्ष में आयोजित किया, जिसका उद्देश्य केवल सम्मेलन आयोजित करना नहीं। बल्कि सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना और संगठित समाज की अवधारणा को व्यवहारिक रूप देना रहा। इन सम्मेलनों की सबसे बड़ी विशेषता उनका ग्राम व बस्ती स्तर तक पहुंचना रहा। कुल 4 लाख 57 हजार 482 परिवारों से व्यक्तिगत संपर्क स्थापित किया। स्वयंसेवकों ने घर-घर जाकर निमंत्रण दिया। संवाद स्थापित किया और सम्मेलन के उद्देश्य समझाए। गांव-गांव पीले चावल देकर पारंपरिक तरीके से आमंत्रण दिया। इससे लोगों में आत्मीयता और सहभागिता की भावना बढ़ी। आंदोलन में 4 हजार 585 शोभायात्राएं निकाली, जिनमें पारंपरिक वेशभूषा, भगवा ध्वज, बैंड-बाजे और सांस्कृतिक झांकियों से समाज में उत्साह का संचार किया। इसके अतिरिक्त 18 हजार 67 प्रभात फेरियों का आयोजन किया, जिनमें सुबह के समय में गांवों और कस्बों में जागरण संदेश दिया। इन गतिविधियों ने आयोजन को जनआंदोलन का स्वरूप दिया। सफल आयोजन के लिए 2 लाख 83 हजार 147 प्रचार पत्रकों का वितरण किया। सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया, पोस्टर और बैनरों के माध्यम से व्यापक प्रचार किया। 8 हजार 954 सक्रिय कार्यकर्ताओं ने विभिन्न स्तरों पर जिम्मेदारी संभालते हुए कार्यक्रमों को सफल बनाया। बांसवाड़ा जिले में 136 मंडल व बस्तियों में सम्मेलन आयोजित हुए। सागवाड़ा में 122 स्थानों पर कार्यक्रम हुए, जबकि डूंगरपुर जिले में 107 मंडल व बस्तियों में हिंदू सम्मेलन आयोजित किए। प्रत्येक जिले में स्थानीय समाज नेतृत्व, संत-महात्माओं और सामाजिक संगठनों का सहयोग प्राप्त हुआ। सम्मेलनों में मातृ शक्ति की उल्लेखनीय भूमिका रही। कुल 3 लाख 28 हजार 765 महिलाओं ने कलश यात्राओं से सक्रिय सहभागिता निभाई। इन कलश यात्राओं ने न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण किया। बल्कि समाज में महिलाओं की नेतृत्वकारी भूमिका को रेखांकित किया। कई स्थानों पर महिलाओं ने स्वयं आयोजन की व्यवस्था संभाली और समाज को संगठित करने में अग्रणी भूमिका निभाई।

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