वादों के मलबे में दबा रामनगर का अयोध्या नगर  विस्थापन का नया अध्याय, अधूरी वादे एक बार फिर दोहराए

वादों के मलबे में दबा रामनगर का अयोध्या नगर  विस्थापन का नया अध्याय, अधूरी वादे एक बार फिर दोहराए 

रामनगर। रामनगर कोयला खदान के विस्तार के लिए जब 1999 में पहली बार लोगों का विस्थापन हुआ था, तब सरकारी दस्तावेजों में वादों की एक लंबी-चैड़ी सूची दर्ज हुई थी पक्के मकान, बिजली, पानी, अस्पताल, स्कूल और सड़कें। पर 25 साल बीतने के बाद भी जमीन तो गई, पर जिंदगी की बुनियाद अब भी खोखली है। अब एक बार फिर 2025 में नया विस्थापन प्रस्तावित है। लेकिन इस बार जनता के पास एक ही सवाल है जिसने पहली बार घर छीना, वो दूसरी बार कैसे भरोसा देगा?

पानी के नाम पर प्यास टंकी तो दूर, कुएं और हैंडपंप तक नहीं

1999 में किए गए वादों के तहत रामनगर में एक लाख लीटर क्षमता वाली जल टंकी और पाइपलाइन युक्त जल वितरण प्रणाली की योजना बनाई गई थी। नगर परिषद डोला ने इसके लिए वार्ड क्रमांक 2, 4, 11 और 12 में जमीन भी आवंटित कर दी थी। लेकिन आज तक न टंकी बनी, न पाइपलाइन बिछी। इतना ही नहीं, कॉलरी प्रबंधन ने कुएं और हैंडपंप तक की भी कोई व्यवस्था नहीं की। रामनगर के अधिकांश परिवार आज भी पुराने सूखे कुओं और दूरदराज के सार्वजनिक हैंडपंपों पर निर्भर हैं, जिनमें से कई महीनों से खराब पड़े हैं। गांव की एक बुजुर्ग महिला कहती हैं, “कोयला हमसे लिया, पर एक बाल्टी पानी तक नहीं दे सके।” गर्मियों में हालात इतने खराब हो जाते हैं कि एक बाल्टी पानी की कीमत पूरे दिन की मेहनत से चुकानी पड़ती है।

अस्पताल है, पर डॉक्टर नहीं

सी सेक्टर का औषधालय रामनगर विस्थापितों के लिए आरक्षित बताया गया था। लेकिन वास्तविकता यह है कि वहां एक भी डॉक्टर पदस्थ नहीं है। केवल चार नर्सें और एक कंपाउंडर पूरे क्षेत्र की स्वास्थ्य जरूरतें संभाल रहे हैं।बिना किसी दवा की व्यवस्था, जाँच सुविधा या आपातकालीन चिकित्सा सहायता के, यह अस्पताल एक निष्क्रिय इमारत बनकर रह गया है।स्थानीय लोग तंज करते हैं ष्यह अस्पताल नहीं, एक प्रतीक्षा कक्ष है, जहां इलाज नहीं, केवल उम्मीदें दम तोड़ती हैं।

ब्लास्टिंग से थर्राया रामनगर

रामनगर में हो रही हैवी ब्लास्टिंग से हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि मकानों की दीवारों में दरारें आ गई है, छतें झुक गई हैं, और खिड़कियां कांपने लगी हैं। यहां तक कि नगर परिषद डोला का कार्यालय भवन तक इन झटकों से नहीं बच पाया है। फिर भी ब्लास्टिंग जारी है  बिना किसी संरचनात्मक सर्वेक्षण या मुआवजे की व्यवस्था के। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि जब तक पुनर्वास नहीं होता, तब तक ब्लास्टिंग पर पूर्ण रोक लगाई जाए। “हमारे घरों के साथ हमारे हौसले भी हिल रहे हैं,” एक ग्रामीण युवक ने कहा।

राम मंदिर पर लोगों की दो टूक

रामनगर का भव्य राम मंदिर न केवल धार्मिक भावना का केंद्र है, बल्कि पूरे क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान भी है। अब खदान विस्तार की जद में आने के कारण इस मंदिर को भी तोड़े जाने की तैयारी है। पुजारी और श्रद्धालुओं ने यह साफ कहा है कि पहले नया मंदिर बने, उसमें विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा हो, तभी विस्थापन स्वीकार किया जाएगा।
मंदिर निर्माण के लिए प्रस्तावित राशि को लेकर भी लोगों ने पारदर्शिता की मांग की है कृ “या तो टेंडर प्रक्रिया से निर्माण हो या फिर सीधे समिति को राशि सौंपी जाए।”
भाषण नहीं, प्रमाण चाहिए

23 मई 2025 को रामनगर के राम मंदिर परिसर में कॉलरी प्रबंधन द्वारा जनचर्चा आयोजित की गई। लेकिन यह जनसुनवाई जल्दी ही जनाक्रोश में बदल गई। लोगों ने पुरानी अधूरी योजनाओं और लगातार हो रहे उपेक्षा के खिलाफ जमकर विरोध जताया। “आपने 1999 में जो कहा था, उसमें से एक भी वादा पूरा नहीं किया, अब हम कैसे मान लें कि इस बार कुछ बदलेगा?” यह सवाल बार-बार गूंजा। प्रबंधन कोई ठोस जवाब नहीं दे सका और जनचर्चा बिना किसी निष्कर्ष के समाप्त हो गई।

पहले पुनर्वास, फिर विस्थापन

रामनगर की जनता अब इस बात पर अड़ी हुई है कि जब तक उन्हें पक्के मकान, स्वच्छ जल, इलाज की सुविधा, शिक्षा केंद्र और मंदिर की व्यवस्था नहीं मिलती कृ कोई विस्थापन संभव नहीं है एक बुजुर्ग विस्थापित का दर्द इन शब्दों में झलकता है। ष्अब नारे नहीं, काम चाहिए। कागजी योजनाओं से पेट नहीं भरता, और न पानी आता है,ये खबर सिर्फ रामनगर की नहीं, बल्कि उन तमाम आवाजों की है जो विकास के नाम पर बार-बार मिटाई जाती हैं, लेकिन कभी पूरी तरह ख़ामोश नहीं होतीं। अब वक्त है कि वादे नहीं, उनके पूरे होने का हिसाब लिया जाए।

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