खेती में मुनाफा बढ़ाने का सबसे सीधा रास्ता है, खर्च कम करें और आय के कई स्रोत बनाएं। विदिशा के गंजबासौदा के ग्राम निवोंदिया में तैयार एक मॉडल इसी सोच पर आधारित है। यहां 3 एकड़ जमीन पर रासायनिक खाद पूरी तरह बंद कर देसी गोबर खाद और जीवामृत से खेती हो रही है। मेड़ों पर फलदार पौधे, बीच में मसाले, दलहन-तिलहन और अनाज की फसल ली जा रही है। ड्रिप सिंचाई से पानी बच रहा है और अलग-अलग समय पर फसल तैयार होने से सालभर नकदी मिल रही है। नामी कंपनी में नेशनल हेड रह चुके दीपक मिश्रा ने नौकरी छोड़कर किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की राह चुनी है। दीपक ने बड़ी क्यारियां बनाकर मेड़ों पर करीब 150 आम, 500 ड्रैगन फ्रूट और 100 पपीते के पौधे लगाए हैं। बीच की जमीन पर हल्दी, गेहूं, दलहन, तिलहन और मौसमी सब्जियां बोई गई हैं। तुअर की ऐसी किस्म लगाई गई है, जो एक बार बोने के बाद कई साल तक उत्पादन देती है। इससे खेत से एक साथ नहीं, बल्कि अलग-अलग समय पर आय मिलती है। खेत में अच्छे जीवाणु (बैक्टीरिया) का घोल भी स्वयं तैयार कर डाला जाता है, जिससे मिट्टी की ताकत बढ़े और पौधों की जड़ मजबूत हो। खेती को गाय पालन से जोड़ा गया है। देसी गाय के गोबर से केंचुआ खाद (वर्मी कम्पोस्ट), जीवामृत और अन्य देसी घोल तैयार किए जाते हैं। इससे बाजार से खाद और दवा खरीदने का खर्च घटा है। मिश्रा के अनुसार पहले की तुलना में अब लागत 30-40% तक कम हुई है। मिट्टी भुरभुरी हो रही है और पैदावार की गुणवत्ता बेहतर हुई है। गायों के लिए खेत में ही नेपियर घास उगाई जा रही है। इससे चारा भी बाहर से नहीं खरीदना पड़ता और पूरा चक्र खेत के भीतर ही चलता है। ड्रिप से पानी और बिजली की बचत
पूरे खेत में ड्रिप सिंचाई लगाई गई है। पानी सीधे पौधों की जड़ तक पहुंचता है, जिससे बर्बादी रुकती है। कम पानी में ज्यादा क्षेत्र सींचा जा रहा है और बिजली का खर्च भी घटा है। निवोंदिया में तैयार यह मॉडल अब आसपास के किसानों के लिए सीख बन रहा है। इसी तरीके से मंडीदीप और रायसेन क्षेत्र में भी खेती विकसित की जा रही है। हर मौसम में बिक्री
फलदार पौधे लंबी अवधि की आय देते हैं, जबकि हल्दी, सब्जियां और दलहन जल्दी तैयार होकर तुरंत नकदी देती हैं। गेहूं और तिलहन से अतिरिक्त आय मिलती है। इस तरह खेत में हर समय कोई न कोई फसल बिकने योग्य रहती है। ऐसे समझें देसी पद्धति
यह खेती गाय आधारित है। इसमें देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से बने घोल जैसे जीवामृत, घनजीवामृत, पंचगव्य और केंचुआ खाद का उपयोग किया जाता है। उद्देश्य मिट्टी की सेहत सुधारना और रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करना है। ऐसे समझें कम लागत मॉडल का पूरा गणित
इस मॉडल में खेत को हिस्सों में बांटकर अलग-अलग समय पर तैयार होने वाली फसलें ली जाती हैं। फलदार पौधे लंबी अवधि की आय देते हैं, जबकि मसाले और सब्जियां जल्दी नकद पैसा देती हैं। देसी खाद से मिट्टी की ताकत बनी रहती है और बाहर से खाद-दवा खरीदने की जरूरत कम पड़ती है। यही संतुलन खेती को जोखिम से बचाकर स्थिर कमाई का रास्ता देता है।


