विश्व रेडियो दिवस आज:39 साल पहले रेडियो सुनने लगता था लाइसेंस; सागर के जैन परिवार ने साझा की जानकारी

आज रेडियो दिवस है। सागर में वर्तमान में रेडियो के तीन एफएम चैनल चलते हैं। इनमें एक आकाशवाणी का और दो निजी एफएम हैं। लोग वर्तमान में इन्हें अपने मोबाइल, टीवी से लेकर रेडियो तक में सुन सकते हैं। इसका कोई शुल्क भी नहीं है। जिस एफएम या रेडियाे चैनल को सुनने का मन हो, उसे ट्यून करो या एप डाउनलोड कर सुनना शुरू कर दो। घर से लेकर दुकान, वाहन आदि में कहीं भी आप इसे सुन सकते हैं। परंतु 39 साल पहले ऐसी व्यवस्था नहीं थी, तब रेडियाे सुनने के लिए बाकायदा लाइसेंस लेना पड़ता था। वार्षिक शुल्क भरना पड़ता था। सालाना रिनुवल भी कराना पड़ता था। बिना इसके रेडियो सुनने पर जुर्माना तक लगता था। दैनिक भास्कर से यह जानकारी रेडियो के परंपरागत श्रोता बंटी जैन ने साझा की। उन्होंने बताया कि शहर में कई लोगों ने अभी भी पुराने लाइसेंस और रेडियो अभी भी संभालकर रखे हुए हैं। ये रेडियो आज भी चालू हैं। पिता ने 1966 में लिया लाइसेंस, 1985 तक कराया नवीनीकरण बंटी जैन ने बताया कि उनके पिता स्वर्गीय हुकुमचंद जैन ने 25 जनवरी 1966 को रेडियो सुनने का लाइसेंस लिया था। तब 15 रुपए शुल्क लिया था। हर साल इसका रिनुअल भी कराना पड़ता था, इसका शुल्क भी 15 रुपए साल ही लगता था। आखिरी बार 25 जनवरी 1985 को रिनुअल कराया था, उसके बाद रेडियो सुनना निशुल्क हो गया था। भारतीय डाक विभाग लाइसेंस जारी करता था जैन ने बताया कि रेडियो सुनने लाइसेंस भारतीय डाक तार विभाग जारी करता था। यह लाइसेंस उसी प्रकार का होता था, जिस प्रकार से आज वाहन चलाने, हथियार रखने या अन्य किसी काम के लिए लाइसेंस बनाना पड़ता है। रेडियो सुनने के लिए यह लाइसेंस भारतीय डाक विभाग, भारतीय तार अधिनियम 1885 के अंतर्गत जारी करता था। लाइसेंस में रेडियो का मैक और मॉडल का भी उल्लेख किया जाता था। घरेलू-व्यवसायिक आधार पर मिलता था लाइसेंस रेडियो का लाइसेंस डोमेस्टिक व कॉमर्शियल दो प्रकार का होता था। यानी घर पर बैठकर रेडियो सुनना है तो डोमेस्टिक और सामूहिक रूप से कई लोगों को रेडियो सुनाना है तो वह कॉमर्शियल। बिना लाइसेंस के रेडियो कार्यक्रमों को सुनना कानूनी अपराध माना जाता था। जिसमें आरोपी को वायरलेस टेलीग्राफी एक्ट 1933 के अंतर्गत दंडित किए जाने का भी प्रावधान था। पहले रेडियो सुनने इकट्ठा हो जाता था मोहल्ला जैन बताते हैं कि अब तो मोबाइल, टीवी हर जगह मनोरंजन उपलब्ध है। परंतु चार दशक पहले तक रेडियो ही सबसे बड़ा सहारा था। टीवी के लिए बिजली कम मिलती थी और चुनिंदा घरों में ही होती थी। उसी तरह रेडियो भी बहुत ही कम लोग रखते थे। गांव-मोहल्लों में एक या दो घर में ही रेडियो होता था और पूरे लोग इसे सुनने के लिए उनके घरों के बाहर जमा हो जाते थे, जिनके पास रेडियो था।

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