शंकराचार्य मठ इंदौर में प्रवचन:दूसरों की मदद करने से स्वत: ही हो जाती है अपनी मदद- डॉ. गिरीशानंदजी महाराज

जीवन में परिवर्तन होते रहते हैं पर हर परिवर्तन का सामना व्यक्ति को धैर्य और साहस से करना चाहिए। दिन है तो रात होती है, रात है तो दिन होता है। यदि दु:ख है तो सुख दरवाजा खटखटा रहा है और सुख है तो दु:ख दरवाजा खटखटा रहा है। इसलिए हर परिस्थिति में संयमित रहना चाहिए। दूसरों की मदद करने से अपनी मदद स्वत: ही हो जाती है। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में शुक्रवार को यह बात कही। डॉक्टर बोला- आपने मुझसे सेवा करवाई, इससे बड़ा कुछ भी नहीं महाराजश्री ने एक दृष्टांत सुनया- एक गरीब परिवार था। श्रम द्वारा अर्जित आय से अपने खुशहाल गृहस्थ जीवन को व्यतीत कर रहा था। उस व्यक्ति का नाम था धनंजय। घर में पति-पत्नी के अलावा कोई नहीं था। पत्नी गर्भवती हो गई। धनंजय दंपत्ती बहुत खुश हुए। नौवें महीने में धनंजय की गर्भवती स्त्री बच्चे को जन्म देने वाली थी, कि धनंजय की मृत्यु हो गई। अब वह पति की मृत्यु का शोक मनाए या नवजात शिशु का हर्ष? वह सोचती कि मेरा और मेरे बच्चे का जीवन कैसे चलेगा? लोगों ने समझाया कि बच्चे की तरफ देखो, यही तुम्हारा जीवन में साथ देगा। बच्चा बड़ा हुआ। उसने मजदूरी करके बच्चे को 12 साल का कर दिया। स्कूल में पढ़ाया और वह अचानक बीमार हो गई। बच्चे से उसने कहा- मैं अब बचूंगी नहीं, पर तेरे पिता की इच्छा थी कि तू पढ़-लिखकर बहुत बड़ा आदमी बने। तू मेहनत करके पढ़ना, पर भीख नहीं मांगना। इतना कहकर उसने दम तोड़ दिया। बच्चा मां के द्वारा रखे कुछ पैसों से कुछ दिन तक तो अपना खर्च चलाता रहा, फिर वह पढ़ता और फ्री समय में मजदूरी करता, स्कूल की फीस चुकाता, बचे पैसों का भोजन करता। एक बार उसे दो दिनों तक खाना नहीं मिला। वह भूखा रहा उसने सोचा मां ने भीख मांगने से मना किया है, पर मदद मांगने के लिए नहीं। वह एक घर पर गया, दरवाजा खटखटाया। एक महिला घर में से निकली। उसने पूछा- बेटा क्या काम है? उस बच्चे को कुछ मांगने की हिम्मत नहीं हुई। उसने पानी मांग लिया पर वह महिला समझ गई कि यह भूखा है। वह एक गिलास दूध ले आई, साथ में कुछ लड्‌डू भी ले आई। बच्चे ने दूध पिया, लड्‌डू खाया और बोला कि आप मुझसे कुछ ले लें। महिला बोली- जब तुम बड़े हो जाओ तो किसी की मदद कर देना। महिला ने देखा कि वह उसके बच्चे के साथ पढ़ता है, जब उसे यह पता चला कि उसका कोई नहीं है, तो महिला अपने लड़के के साथ उसकी भी फीस चुका देती। उसे पता ही नहीं चलने दिया। कुछ समय बाद वह शहर पढ़ने चला गया। महिला का बालक व्यापारी बन गया। इस बीच, महिला को कैंसर हो गया। डॉक्टरों ने कहा कि इसे बड़े शहर ले जाओ। महिला के बेटे ने बड़े शहर ले जाकर एक बड़े अस्पताल में इलाज कराया। उसके सब पैसे खर्च हो गए। व्यापार भी ठप हो गया। महिला के बेटे ने देखा कि हॉस्पिटल का एक बड़ा डॉक्टर उसकी मां के पास बैठता, महिला भी सोचती कि इतना बड़ा डॉक्टर मेरे पास बैठता है। एक दिन वह स्वस्थ हो गई। मां ने बेटे से कहा- पता नहीं इलाज का कितना बड़ा बिल आएगा। बेटे ने कहा- मां तू चिंता मत कर। मैं मकान-दुकान बेचकर बिल चुका दूंगा। सबेरे बिल आया। बच्चे के हाथ से मां ने बिल ले लिया। मां ने लिफाफा खोला, उसमें एक पर्ची मिली, जिसमें लिखा था- मां, तुमने मुझे दूध पिलाया था, पांच साल तक मेरे स्कूल की फीस चुकाई थी। अस्पताल का बिल उसी में चुक गया। इतने में वह बड़ा डॉक्टर आया। उसने मां के पैर छु्ए, कहा मां- तुम्हारी बात मुझे आज भी याद है, तुमने कहा था- बड़े होकर किसी की मदद करना। मां की आंखों से खुशी के आंसू छलक आए। डॉक्टर बोला- आपने मुझसे सेवा करवाई, इससे बड़ा मेरे लिए कुछ भी नहीं है। आप ही मेरी मां हैं।

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