शादी बिना बोझ की:गांव वाले बने रिश्तेदार, खुद के खर्चे से 5 जोड़ियों की शादी कराई; दहेज और दिखावे से मुक्त विवाह का संदेश

सामाजिक बदलाव की यह प्रेरणादायक तस्वीर छत्तीसगढ़ के बालोद जिले की है। जहां जिला मुख्यालय से 18 किमी दूर ग्राम लिमोरा में पांच जोड़ों का मंडप सजा है। इन मंडपों में नाच-गान, हल्दी की रस्म और पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन करते हुए जो लोग नजर आ रहे हैं, वे सभी इसी गांव के हैं। दरअसल यहां दूल्हा और दुल्हन के पक्ष से घराती और बाराती की भूमिका गांव के ग्रामीण ही निभा रहे हैं। ऐसा इसलिए किया जा रहा है, ताकि विवाह के दौरान वर और वधु पक्ष को होने वाली आर्थिक कठिनाइयों को कम किया जा सके और गांव व समाज स्तर पर सामूहिक विवाह को बढ़ावा मिल सके। दो जोड़े अपने गांव के, तीन पड़ोसी गांवों से गांव के रिटायर्ड शिक्षक रोहित कुमार अठनागर बताते हैं कि इस पहल को वृहद रूप देने के लिए कम से कम पांच जोड़ों का विवाह कराना तय किया गया था, लेकिन गांव में उस समय केवल दो ही जोड़े विवाह योग्य थे। ऐसे में बाकी तीन जोड़िया पड़ोस के गांव अमोरा, करहीभदर और भेड़िया नवागांव से लाई गईं। इनमें से कुछ के रिश्ते तय हो चुके थे। कुछ के रिश्ते जल्दी तय कराए गए। हर घर का सहयोग, गांव ने उठाया पूरा खर्च गांव के सरपंच जालम सिंह पटौदी बताते हैं कि हल्दी और मायन की रस्में पूरी कर फेरे भी हो गए। इस आयोजन में गांव का हर व्यक्ति सहभागी है, जहां हर घर से लोगों ने चावल सहित अन्य जरूरी सामग्रियां दी हैं। आयोजन की तमाम व्यवस्थाएं सेवा निवृत्त और वर्तमान में कार्यरत शासकीय कर्मचारी मिलकर संभाल रहे हैं और पूरा खर्च गांव सामूहिक रूप से वहन कर रहा है। हम दहेज प्रथा और दिखावे के सख्त खिलाफ पूर्व शिक्षक कपिल राणा ने बताया कि हम दहेज प्रथा और वैवाहिक आयोजनों में दिखावे की परंपरा के सख्त खिलाफ हैं, क्योंकि विवाह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि दो परिवारों के आत्मीय मिलन का संबंध होता है। हमारे गांव के कई लोग नाचा कार्यक्रमों के माध्यम से अलग-अलग जगहों पर दहेज प्रथा और फिजूल खर्ची का विरोध करते आ रहे हैं। इसी सामाजिक चेतना और जिम्मेदारी को समझते हुए यह सामूहिक विवाह आयोजन किया गया है। हर गांव में सामूहिक विवाह की परंपरा हो आयोजन समिति के सदस्य और लिमोरा के पूर्व सरपंच मुकेश साहू कहते हैं कि इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य समाज में जागरूकता लाना है। उनका मानना है कि समाज का पहला दायित्व होना चाहिए कि विवाह योग्य बेटा-बेटियों का विवाह सामूहिक रूप से और सामाजिक सहयोग से कराया जाए, ताकि गरीब परिवार विवाह के बाद कर्ज के बोझ तले दबने से बच सकें।

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