शक्ति साधना का पर्व शारदीय नवरात्रा, आश्विन शुक्ला प्रतिपदा सोमवार संवत 2082 दिनांक 22 सितम्बर 2025 से प्रारम्भ होकर आश्विन शुक्ला नवमी बुधवार दिनांक 01 अक्टूबर 2025 को पूर्ण होंगे। होमाष्टमी आश्विन शुक्ला अष्टमी मंगलवार दिनांक 30-सितम्बर-2025 को रहेगी। ज्योतिष एवं वास्तुविद आचार्य प्रदीप दवे ने बताया कि घट स्थापना का शुभ मुहूर्त प्रातः 06-30 से 08-00 अमृत वेला में, प्रातः 09-30 से 11-00 तक शुभ वेला में, मध्यान्ह 12-06 से 12-54 अभिजित मुहूर्त में, सायं 03-31 से 06-31 शुभ वेला में तथा गोधुली वेला में सायं 07-01 से 08-15 श्रेष्ठ रहेगा। नवरात्रा में पूजा एवं अनुष्ठान के प्रमुख नियम 1- नवरात्रि के नौ दिन स्नानादि से पवित्र होकर माताजी के सम्मुख पवित्र आसन पर बैठकर चंडी पाठ करना चाहिए।
2- माताजी को स्नान करवाने एवं कपड़े बदलने का अधिकार सिर्फ महिलाओं को ही है, अतः यथासंभव महिलाओं को ही माताजी को स्नान कराकर कपड़े बदलने चाहिए।
3- माताजी को चुनरी नहीं ओढ़ानी चाहिए। चुनड़ी ओढ़ाने से भाई-बहन का रिश्ता हो जाता है।
4- समृध्दि के लिए घी का दीपक तथा रोग नाश के लिए तेल का दीपक करना चाहिए। घी का दीपक माताजी के दाहिने हाथ की तरफ तथा तेल का दीपक माताजी के बायें हाथ की तरफ स्थापित करना चाहिए।
5- खंडित फल एवं श्रीफल माताजी को नहीं चढ़ते है। अतः माताजी को फल एवं श्रीफल अखंड चढ़ाने चाहिए।
6- माताजी के पूजा, उपवास एवं व्रत में दूध के उपयोग की मनाही है, अतः साधक को नवरात्रि काल में दूध के उपयोग से बचना चाहिए क्योंकि दूध का शगुन लेना भी मना है।
7- नौ कन्या व दो बच्चों को भोजन करवाने से नवरात्रि का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
8-माताजी की पूजा करते समय साफा नहीं पहनना चाहिए। यदि साफा पहना भी है तो उतार कर माताजी के चरणों में रख देना चाहिए, इससे समस्त गुनाह माफ हो जाते हैं।
9- विसर्जन सिर्फ खंडित मूर्तियों का ही होता है। अतः सजीव प्रतिमाओं का विसर्जन नहीं करना चाहिए।
10-माताजी के भोग-महाप्रसादी में प्याज व लहसुन का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
11- यह ध्यान रहे कि भैंरुजी, क्षेत्रपालजी व खेतलाजी तीनों एक ही रूप है और इनके मंदिर नहीं बनते है क्योंकि इनके थान होते है।
12- अखण्ड दीपक का संकल्प नहीं लेना चाहिए क्योंकि यदि किसी कारणवश अखण्ड दीपक बुझ जाता है तो उसका दोष लगता है।
13- माताजी को केवल एक ही आयटम “लप्सी” का भोग नहीं लगाना चाहिए क्योंकि माताजी को तो 56 भोग चढ़ते है। अतः प्रतिदिन भोग एवं प्रसाद बदलते रहना चाहिए। शक्ति की साधना के लिए वर्ष में चार नवरात्रि आती है-
1- चैत्रीय बासंतिक नवरात्र
2-आषाढ़ी गुप्त नवरात्रि
3- आश्विन मास की शारदीय नवरात्रि
4- माघ मास की गुप्त नवरात्रि


