शिकारियों का नेटवर्क अब भी सक्रिय:तीन साल में तस्करी के 100 से ज्यादा मामले छूट रहे आरोपी, सामाजिक बहिष्कार की तैयारी

छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों के अवैध शिकार पर रोक लगाने के लिए वन विभाग लगातार कार्रवाई कर रहा है, लेकिन शिकारियों के नेटवर्क को पूरी तरह तोड़ना और दोषियों को सज़ा दिलाना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। पिछले तीन वर्षों में प्रदेश में करीब 100 वन्य अपराध दर्ज किए गए हैं और बड़ी संख्या में आरोपियों की गिरफ्तारी भी हुई है। कई मामलों में चालान पेश किए जा चुके हैं, जबकि अनेक प्रकरण न्यायालय में लंबित हैं। इसके बावजूद अवैध शिकार की घटनाएं पूरी तरह थमती नजर नहीं आ रहीं। हाल ही में उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में जनवरी 2026 के दौरान वन विभाग ने अवैध शिकार के आरोप में तीन शिकारियों को गिरफ्तार किया। आरोपियों के पास से बंदूक, लगभग 3.1 किलोग्राम जंगली सुअर का मांस, भालू का पंजा और फंदे बरामद किए गए। यह कार्रवाई दर्शाती है कि संरक्षित क्षेत्रों में भी शिकारी सक्रिय हैं और संगठित तरीके से काम कर रहे हैं। वन्य अपराध सिर्फ टाइगर रिजर्व तक सीमित नहीं हैं। धमतरी, कोरबा और सरगुजा जैसे जिलों में भी फंदे लगाकर शिकार करने और अवैध तस्करी से जुड़े मामलों में गिरफ्तारियां हुई हैं। बरामदगी में देसी हथियार, वायर ट्रैप, संरक्षित जीवों के अंग और मांस शामिल रहे हैं। विभागीय अधिकारियों का मानना है कि इन घटनाओं के पीछे छोटे स्थानीय सहयोगियों से लेकर बड़े नेटवर्क तक की भूमिका हो सकती है।
तेंदुए की खाल, भालू के नाखून और पैंगोलिन की तस्करी ज्यादा संयुक्त ऑपरेशन और तकनीकी निगरानी
वन विभाग ने संवेदनशील इलाकों में एंटी-पोचिंग टीमों की तैनाती बढ़ाई है। ड्रोन सर्विलांस, खुफिया सूचना तंत्र और स्थानीय पुलिस के साथ संयुक्त अभियान चलाए जा रहे हैं। कई मामलों में आरोपियों को मौके से पकड़कर न्यायालय में पेश किया गया है। अवैध शिकार और तस्करी के मामलों में आरोपियों पर वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत कार्रवाई की जाती है। इस कानून में संरक्षित प्रजातियों के शिकार पर कठोर सज़ा और भारी जुर्माने का प्रावधान है। सामाजिक बहिष्कार का नया प्रयास
वन विभाग अब कानूनी कार्रवाई के साथ सामाजिक स्तर पर भी पहल कर रहा है। अधिकारियों के अनुसार कई मामलों में आसपास के गांवों के लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शिकारियों की मदद कर देते हैं। इसे रोकने के लिए ग्रामीणों को जागरूक किया जा रहा है कि शिकार में लिप्त लोगों का सामाजिक बहिष्कार करें। अधिकारियों का कहना है कि अधिकांश ग्रामीण वन्यजीवों को अपनी धरोहर मानते हैं और संरक्षण के पक्ष में हैं। ऐसे में सामुदायिक दबाव अपराध की रोकथाम में प्रभावी भूमिका निभा सकता है। विशेषज्ञों की राय: वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि केवल गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं है। स्थानीय समुदाय की भागीदारी, पारदर्शी निगरानी व्यवस्था, एआई आधारित कैमरा ट्रैप और तकनीकी ट्रैकिंग सिस्टम का व्यापक उपयोग जरूरी है। जब तक ग्रामीणों को संरक्षण की प्रक्रिया में साझेदार नहीं बनाया जाएगा, तब तक शिकार पर स्थायी रोक मुश्किल है।

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