नमस्कार पद की रेस में पैदल चलने वाले नेताजी ने लग्जरी कारों वाले युवा नेताजी को पछाड़ दिया। उधर, पूर्व सांसदजी ने कंबल बांटने में धर्म का अंतर किया था, इधर कोटा में शिक्षा मंत्रीजी ने ‘गाय-भैंस के दूध’ में फर्क कर दिया। हनुमानगढ़ में तो श्मशान में ही ताश के पत्ते बंट गए। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में.. 1. AI वाले गहलोत-पायलट की चर्चा आपने कछुआ-खरगोश वाली कहानी सुनी होगी। दोनों में रेस हुई। कछुआ लगातार चलता रहा और जीत गया। खरगोश ओवर कॉन्फिडेंस में आकर सो गया और हार गया। हालांकि, हमारी कहानी वाला ‘खरगोश’ तो सोया भी नहीं। युवाओं के साथ खूब नजर आया। कई जगह धरने-प्रदर्शन में पहुंचा। अरावली को बचाने के लिए पैदल यात्रा निकाली। अब खरगोश के पास ‘सफेद रंग की रफ्तार’ है तो इसमें बेचारे खरगोश का क्या दोष? कुछ लोग कह रहे हैं कि खरगोश इसलिए नहीं जीता क्योंकि उसने लग्जरी कारों का दिखावा किया। अब भैया जिसके पास लग्जरी कारें हैं तो वह दिखाएगा। बल्कि लग्जरी कारों का काफिला है। सोशल मीडिया पर कई पोस्ट तो कारों के कारवां की हैं। खूब सपोर्ट भी है। एक AI वाला मीम बहुत घूम रहा है। इसमें गहलोत और पायलट सोफे पर बैठकर चर्चा कर रहे हैं कि रेस में विनोद जाखड़ क्यों आगे निकल गए। संवाद कुछ इस तरह है- गहलोत- विनोद जाखड़ अध्यक्ष बना कैसे? मीणा कहते हैं कि नरेश ने बनवाया। गुर्जर कहते हैं पायलट ने बनवाया। बैरवा कहते हैं कि डीसी ने बनवाया। माली कहते हैं कि गहलोत ने बनवाया। पायलट-साहब। जाखड़ ने चुपचाप मेहनत की है। औरों की तरह सोशल मीडिया पर लग्जरी गाड़ियां नहीं दिखाई हैं। इसलिए बन गया। 2. शिक्षा मंत्रीजी का गाय वाला ज्ञान कुछ लोग बाजार से डिटर्जेंट पाउडर, यूरिया, साबुन का घोल, रिफाइंड ऑयल और केमिकल की खरीद करके गुजर रहे थे। रास्ते में पता चला कि शिक्षा मंत्रीजी किसी कार्यक्रम में भाषण दे रहे हैं। भाषण की आवाज पगडंडी तक आ रही थी। कतार में सबसे आगे यूरिया का कट्टा सिर पर उठाए चल रहा व्यक्ति बोला- यार, मंत्रीजी का भाषण कभी नहीं सुना। आओ सुनते हैं। सभी लोग सभास्थल पर सबसे पीछे जाकर खड़े हो गए। मंत्रीजी ने कहा- कुछ गायें और भैंसें चुन लो। ऐसी चुनना जिन्होंने 3-4 दिन पहले बच्चे को जन्म दिया हो। एक तरफ गायें खड़ी कर दो, दूसरे तरफ भैंसें खड़ी कर दो। अब दोनों के बच्चों को एक जगह से एक साथ छोड़ो। भैंस का बच्चा एक भैंस के नीचे जाएगा। यह उसकी मां नहीं है। फिर दूसरी के नीचे, तीसरी के नीचे, चौथी के नीचे जाएगा। उसे मुश्किल से अपनी मां मिलेगी। जबकि गाय का बच्चा सीधे अपनी मां के पास जाएगा और दूध पीने लग जाएगा। सभास्थल का टेन्ट तालियों से गूंजने लगा। खरीदारी कर आए लोग भी सामान नीचे रख ताली बजाने लगे। मंत्रीजी ने बात आगे बढ़ाई- यानी गाय का दूध पीने वाला बच्चा होशियार होता है। भैंस का बच्चा माइंड से ठस होता है। दूध पीने के बाद भैंस का बच्चा बैठकर ऊंघता है, जबकि गाय का बच्चा पूंछ ऊंची कर कूंद-फांद करता है। मंत्रीजी का भाषण निष्कर्ष पर आ गया था। वे बोले- अपने बच्चे को अगर चंचल बनाना है तो गाय का दूध पिलाएं। आलसी बनाना है तो भैंस का दूध पिलाएं। उन्होंने प्रोग्रेसिव तरीके से यही बात समझाई- गाय का बच्चा जब छोटा होता है तो उसे बछड़ा कहते हैं। थोड़ा बड़ा होता है तो कैड़ा कहते हैं। थोड़ा और बड़ा होता है तो नारक्या कहते हैं। और बड़ा हो जाता है तो बैल कहते हैं। लेकिन भैंस का बच्चा कितना ही बड़ा हो जाए, वह पाडे का पाडा ही रहता है। इस बात पर खरीदारी कर आए लोग ठहाका मारकर हंसने लगे। सभा में बैठे लोगों ने पलटकर पीछे देखा। वे संभले। उन्होंने अपना-अपना सामान सिर पर उठाया और चल दिए। यूरिया का कट्टा लेकर चल रहा लीडर बोला- अच्छा है हम गाय-भैंस के दूध के झंझट में नहीं पड़ते। जल्दी पैर बढ़ाओ। नकली दूध बनाना है और शहर में सप्लाई भी करना है। 3. श्मशान में ताश का खेल कुछ लोग फानी दुनिया से चले जाने के बाद भी अमर हो जाते हैं। वे अपने कामों के कारण हर किसी की यादों में बसते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके काम तो सामान्य होते हैं, लेकिन शौक बड़े होते हैं। उनके शौक अमर हो जाते हैं। हनुमानगढ़ के नोहर में ऐसा ही हुआ। गांव की चौपाल पर बुजुर्ग मांगीलाल सैनी अक्सर अपनी मंडली और युवा मित्रों के साथ ताश खेलते थे। मौसम के अनुसार स्थान बदलते रहते रहते ताश का खेल वही रहता। ताश खेलते-खेलते वक्त कट जाता था, हंसी-मजाक हो जाता था, और सबसे बड़ी बात वे खुश रहते थे। एक दिन ताश खेलकर घर पहुंचे और मांगीलालजी ने दुनिया-जहान को अलविदा कह दिया। उम्र हो गई थी। बहुत कष्ट भी नहीं झेला। ऐसे में मित्र मंडली को संतोष कि चलो जाते-जाते ताश खेल गए। गांव-समाज के लोग परिजन-रिश्तेदारों के साथ श्मशान पहुंच गए। मांगीलालजी के साथ ताश खेलने वाली मंडली भी पहुंची। अंतिम संस्कार हुआ। इसके बाद एक साथी ने जेब से ताश की गड्डी निकाली और वहीं श्मशान में ताश खेलने लगे। बोले- मांगीलाल जी की आत्मा को शांति मिलेगी। उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। 4. चलते-चलते… कोरोना के बाद थार का बुखार ऐसा कि संपर्क में आने वाले का दिमाग खराब हो जाता है। गाड़ी बढ़िया है। मजबूत है। लेकिन स्टेटस ऐसा बना दिया गया है कि गाड़ी खरीदने का इच्छुक भला आदमी काली थार से दूरी बना लेता है। पुलिस काली थार आते देख सतर्क हो जाती है। बैरिकेडिंग खींचकर दूर से ही सड़क पर डंडा फटकारने लगती है। लेट नाइट काली थार लेकर कोई चाहे अस्पताल में ब्लड डोनेट करने ही जा रहा है, पुलिस उसे शक की निगाह से देखती है। काली थार का मतलब जरूर इसमें बदमाश ही बैठे होंगे जो आगे जाकर वारदात करने वाले हैं। सच में कई वारदातें हो भी गई। जिनको बदमाशी का शौक है उन लोगों ने गाड़ी की इमेज ही खराब कर दी। स्टंटबाज भी बदमाशी करने में पीछे नहीं हैं। थार के रेगिस्तान में इतने तूफान नहीं आते, जितने लोगों ने थार कार के नाम से मचा रखे हैं। बीकानेर नंबर की एक काली थार का वीडियो खूब घूम रहा है। पहाड़ी ढलान पर कार को चलाने वाला स्टंटबाजी दिखा रहा है। कार चारों टायरों पर ऐसे उछल रही है जैसे गाय का दूध पीने के बाद बछड़ा उछलता है। एक यूजर ने कार का नंबर शेयर करते हुए ट्रैफिक पुलिस से अपील है कि इसके मालिक को ढूंढो और समझाओ कि यह हेलिकॉप्टर नहीं है। कार है। कितनी ही कोशिश कर लो, उड़ नहीं पाएगी। इनपुट सहयोग- शक्ति सिंह हाड़ा (कोटा), दीपक भारद्वाज (हनुमानगढ़)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल मुलाकात होगी..


