शिमला में मेयर कार्यकाल बढ़ाने पर विवाद:हाईकोर्ट में हुई सुनवाई, 5 को फिर सुना जाएगा, 3 पार्षदों की पार्टी बनने की याचिका स्वीकार

शिमला नगर निगम के मेयर का कार्यकाल बढ़ाने से जुड़ी याचिका पर आज हिमाचल हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। अंतरिम आदेश जारी करने की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका पर अब 5 मार्च को आगे सुनवाई होगी। यह मामला चीफ जस्टिस गुरमीत सिंह संघावालिया और जस्टिस बीसी नेगी की बेंच ने सुना। बता दें कि राज्य सरकार ने मेयर का कार्यकाल ढाई साल से बढ़ाकर पांच वर्ष किया है। इसके लिए बाकायदा विधानसभा के विंटर सेशन में अध्यादेश लाया गया। इस अध्यादेश को एक एडवोकेट ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर चुनौती दी। 4 दिसंबर 2025 को सरकार ने संबंधित विधेयक को विधानसभा में पारित कर राज्यपाल को मंजूरी के लिए भेजा। जनवरी 2026 में राज्यपाल ने कुछ आपत्तियों के साथ विधेयक सरकार को लौटा दिया। सरकार ने 16 फरवरी को इसे दोबारा विधानसभा में पेश कर उसी दिन पारित कराया और पुनः राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेज दिया। फिलहाल इस पर मंजूरी लंबित है। संवैधानिक संकट की स्थित: याचिकाकर्ता सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अंजली सोनी वर्मा ने दलील दी कि जब तक विधेयक को राज्यपाल की स्वीकृति नहीं मिल जाती, तब तक मौजूदा कानून के तहत मेयर का कार्यकाल समाप्त माना जाएगा। ऐसे में उनके द्वारा लिए गए निर्णय अवैध ठहराया जाए। उन्होंने तर्क दिया कि इससे नगर निगम में संवैधानिक संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है। याचिका में कुछ पार्षदों के निलंबन और बजट पेश किए जाने जैसे निर्णयों को भी चुनौती दी गई है। सरकार बोली- कार्यकाल बढ़ाने संबंधी अध्यादेश विधानसभा से पारित वहीं, सरकार की ओर से कहा गया कि कार्यकाल बढ़ाने संबंधी अध्यादेश को विधिवत विधानसभा में पारित किया जा चुका है और अब यह राज्यपाल की स्वीकृति की प्रक्रिया में है। तीन पार्षदों का पार्टी बनने को आवेदन स्वीकार इसी प्रकरण में पार्षद आशा शर्मा, कमलेश मेहता और सरोज ठाकुर द्वारा स्वयं को पक्षकार बनाने का आवेदन भी अदालत ने स्वीकार कर लिया है। याचिका में राज्य सरकार के शहरी विकास विभाग, राज्य निर्वाचन आयोग तथा महापौर सुरेंद्र चौहान को प्रतिवादी बनाया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि सरकार ने एक व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से महापौर का कार्यकाल पांच वर्ष करने का अध्यादेश लाया।

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