शौर्य की जीत अधूरी क्यों? जब दुश्मन अब भी सक्रिय है-चैतन्य मिश्रा
अनूपपुर। भारत को अपनी सैन्य शक्ति पर गर्व है यह कोई नया तथ्य नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा है। जब भी देश पर संकट आया है, भारतीय सेना ने अपने अद्वितीय साहस, बलिदान और राजनीतिक कौशल से जवाब दिया है। हाल ही में दुश्मन देश द्वारा की गई नापाक हरकतों का हमारी सेना ने जिस तीव्रता और संकल्प के साथ जवाब दिया, वह निश्चय ही गर्व का विषय है। ऑपरेशन सिंदूर के प्रहार इसका सजीव उदाहरण है, जिसने शत्रु के ठिकानों को नेस्तनाबूद कर दिया और उनकी रणनीतिक कमर तोड़ दी। परंतु, इस सैन्य विजय के मध्य अचानक घोषित सीजफायर ने देशवासियों को आश्चर्यचकित और कहीं-न-कहीं आहत कर दिया।प्रधानमंत्री जी ने स्वयं पहलगाम में हुए कायरतापूर्ण आतंकी हमले के बाद सार्वजनिक रूप से सेना को फ्री हैंड देने की बात कही थी। यह घोषणा आश्वस्त करती थी कि अब कड़ी कार्यवाही होगी। परंतु फिर ऐसा क्या हुआ कि भारत सरकार से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से सीजफायर की घोषणा जैसी सूचना सामने आ गई? यह केवल एक संयोग नहीं हो सकता। यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि भारत सरकार ने दुश्मन को घुटनों पर लाने की इस प्रक्रिया को रोकने का निर्णय किसके दबाव में लिया? क्या हम अंतरराष्ट्रीय राजनीति के किसी अज्ञात सौदे का हिस्सा बन चुके हैं? क्या विश्व गुरु बनने की हमारी आकांक्षा हमें कहीं चेला बना रही है?जब यूक्रेन रूस युद्ध के दौरान भारत ने वैश्विक मंच पर संतुलनकारी भूमिका निभाई, तो उसे वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में सराहा गया। किंतु अब, जब हमारी सीमाओं पर हो रहा संघर्ष स्पष्ट रूप से एकतरफा विजय की ओर बढ़ रहा था, तब अचानक अमेरिका या किसी तीसरे पक्ष के प्रभाव में आकर पीछे हटना देश के सम्मान और शौर्य की भावना को ठेस पहुंचाता है।22 अप्रैल की वह काली तारीख, जब पहलगाम में 26 निर्दोष पर्यटकों की जान गई उनमें एक नेपाली नागरिक भी शामिल था ,आज तक उसकी जवाबदेही तय नहीं हुई है। सरकार ने खुद स्वीकार किया कि इस हमले का इनपुट था, फिर भी न कार्रवाई हुई, न किसी आतंकी का नाम सामने आया। यह लापरवाही नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र की विफलता है। जब सेना हर मोर्चे पर सफलता हासिल कर रही थी, तब राजनीतिक स्तर पर यह चूक हमे किस दिशा में ले जाएगा। हमारे वीरों ने आतंक के गढ़ों को ध्वस्त कर दिया, सैकड़ों आतंकियों को मार गिराया, पर अफसोस यह है कि अंततः उस पर राजनीतिक समझौते की चादर डाल दी गई। पाकिस्तान की नापाक हरकतें आज भी थमी नहीं हैं। सीजफायर की घोषणा के बाद भी सीमा पार से ड्रोन द्वारा हथियारों की आपूर्ति, घुसपैठ की कोशिशें, और आतंकी लॉंचपैड सक्रिय हैं। क्या यही उस तथाकथित शांति प्रक्रिया का हिस्सा है जिसे सरकार ने स्वीकारा? जब तक आतंक की फैक्ट्री पाकिस्तान की धरती पर खुली है, तब तक किसी भी सीजफायर का कोई औचित्य नहीं। यह दुश्मन की नीयत का नहीं, हमारे धैर्य और रणनीति का इम्तिहान है। हमारी सेना हर मोर्चे पर सतर्क है, परंतु क्या राजनीतिक नेतृत्व भी उतना ही सजग है?यह हमारे जवानों के त्याग और पराक्रम के साथ अन्याय है।सीजफायर अगर कूटनीतिक रूप से अनिवार्य था, तो जनता को भरोसे में लिया जाना चाहिए था। वरना यह केवल एकतरफा युद्धविराम नहीं, बल्कि जनआस्थाओं पर विराम है।


