संसार के लिए अमूल्य पूंजी छोड़ गए संत सिंगाजी

बोरगांव बुजुर्ग | संसार में मनुष्य जीवनकाल तो पूरा कर लेता है परंतु अशांत और असंतुष्ट होकर इस संसार से विदा हो जाता है। इस कारण से दुखालय संसार में बार-बार दुख भोगना पड़ता है। गहन निंद्रा और अज्ञान के अंधकार की गर्त में जीवन बीत जाता है। अंत में मृत्यु पश्चात दुखद अधोगति होती है। नौ द्वारों से ऊपर दशम द्वार की खोज करने वाले महापुरुष ही क्षणिक दुख-सुख को शीत-ग्रीष्म समझकर चेतना का उर्ध्वगमन करते हैं तथा जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। संत सिंगाजी ने ग्राम खजूरी में संवत 1576 में जन्म लिया तथा संसारियों के लिए भव से पार करने वाली अमूल्य पूंजी छोड़कर संवत 1616 में महानिर्वाण प्राप्त कर लिया। बोरगांव बुजुर्ग में बुधवार से प्रारंभ संत सिंगाजी परचरी कथा के पहले दिन कथा वाचक चेतना दीदी ने यह उद्‌गार व्यक्त किए। कथा शुभारंभ से पहले ग्राम में हनुमान मंदिर से भव्य कलशयात्रा निकाली गई जो गांव का भ्रमण करते हुए कथास्थल पहुंची। इसमें बड़ी संख्या में ग्रामवासी शामिल हुए।

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