नमस्कार राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी के मुखिया की सादगी सचिवालय में उस समय नजर आई, जब वे अपनी कुर्सी को सही जगह लगा रहे थे। अजमेर में किरोड़ी बाबा ने टिकट कटने और पार्टी से बाहर होने का किस्सा सुनाया। बीकानेर में खेजड़ी को लेकर बच्ची का खूब जज्बा दिखा तो डीडवाना में थाना इंचार्ज साहब ने दिल जीत लिया। राजस्थान की राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. अजमेर में कृषि मंत्री का किस्सा बादल होते हैं तो पुराने दर्द की टीस होने लगती है। यह मौसम विज्ञान और जीव विज्ञान के पारस्परिक संबंधों का उदाहरण है। राजनीति में भी भीड़ जुटती है तो नेता को पुराना दर्द याद आने लगता है। यह राजनीति और सांख्यिकी संबंध का एग्जांपल है। अजमेर में सभा हुई। सभा में कृषि मंत्री पहुंचे। मंत्रीजी को उतनी भीड़ की उम्मीद नहीं थी, जितनी आई थी। ऐसे में जनता के लिए प्यार उमड़ आया। उन्होंने पुराना किस्सा याद करते हुए बताया- एक बार मेरी पार्टी ने मेरा टिकट काट दिया। लोगों ने कहा कि दूसरी पार्टी में क्यों नहीं गए? मैं कैसे जाता? छोटी सी उम्र से RSS की शाखा में जाने लगा था। मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था, इस दौरान इंदिरा जी ने इमरजेंसी लगा दी, मुझे भी जेल में डाल दिया। तब से आज तक अपनी पार्टी के लिए मेहनत करता रहा। चुनाव जीते भी हारे भी। लेकिन हर विपरीत हालत में आप सभी ने मेरी मदद की, इसीलिए आज तक राजनीति में जिंदा हूं। जनता को अपनी सफलता का श्रेय देने के बाद माननीय मंत्री ने चिर परिचित अंदाज में महिलाओं के साथ डांस भी किया। 2. मुख्य सचिव ने सादगी से दी ‘बड़ी सीख’ एक महल में चिड़िया ने घोंसला बना लिया। राजा की नजर पड़ी। मंत्री ने दरबान से घोंसला हटाने को कहा। चिड़िया के बच्चे डर गए। बोले-मां यहां से चलो, घोंसला टूट जाएगा। चिड़िया ने कहा-फिक्र की कोई बात नहीं। घोंसला नहीं हटा। दूसरे दिन राजा ने मंत्री को बुलाया, वही आदेश दिया। बच्चे फिर डरे। चिड़िया फिर निष्फिक्र रही। घोंसला बरकरार। तीसरे दिन राजा ने निजी अंगरक्षक से घोंसला हटाने को कहा। फिर वही हुआ। घोंसला नहीं हटा। चौथे दिन राजा ने घोंसला देखकर कहा-कल इसे मैं खुद हटाऊंगा। चिड़िया ने तुरंत बंदोबस्त किया। बच्चों को लेकर दूसरी जगह शिफ्ट करने लगी। बच्चे बोले-मां अब तक नहीं हटा तो कल भी नहीं हटेगा। चिड़िया बोली- अब घोंसला नहीं रहेगा, राजा ने यह काम खुद करने की ठानी है। ब्यूरोक्रेसी में अगर हर अफसर अपने काम की ऑनरशिप ले ले, तो काम टलने की गुंजाइश ही नहीं। राजस्थान के मुख्य सचिव ने छोटे से काम से बड़ा संदेश दे दिया। हुआ यूं कि सचिवालय में गहमा-गहमी थी। कुछ देर में बजट पर मुख्यमंत्री प्रेस ब्रीफिंग करने वाले थे। अधिकारी फाइलें तैयार कर रहे थे। बारीक से बारीक व्यवस्था पर नजर बनी हुई थी। व्यवस्थाएं देखते हुए मुख्य सचिव वी श्रीनिवास मुख्य सभागार में आए, जहां मंच पर कुर्सियां जमी थी। कुर्सियों की सेटिंग देखकर मुख्य सचिव ने एक अधिकारी से बात की। इशारों में बताया कि मेरी कुर्सी दायें नहीं बायें होनी चाहिए। अधिकारी ने बात सुनी और यह काम करने के लिए किसी कार्मिक को ढूंढने लगे। इतनी देर में मुख्य सचिव खुद मंच पर चढ़े और कुर्सी खींचकर दायें से बायें लगा दी। कहानी और घटना का निष्कर्ष एक- अपना काम अपनी जिम्मेदारी है। 3. खेजड़ी के लिए बच्ची का ‘बड़ा जज्बा’ अब खेजड़ी जरूर बचेगी। यह बात दावे से इसलिए नहीं कही जा रही कि बीकानेर में बड़ा आंदोलन हो रहा है। महापड़ाव डाला गया। हजारों की भीड़ जुटी। बड़े नेता आए। बड़े समाजसेवी आए। बड़े पर्यावरणविद आए। खूब भाषण हुए। खूब रीलें बनीं। खूब दावे किए गए। खूब वादे किए गए। कई प्रस्ताव रखे गए। न भीड़ जुटने से कोई मिशन कामयाब होता है न बड़े दावों से। काम के पीछे जज्बा कितना बड़ा है, यही बड़ी है। खेजड़ी बचाओ के नारे के साथ बीकानेर में महापड़ाव हुआ। महापड़ाव के लिए बिज्जू प्रधान भागीरथ गांव-गांव जाकर पीले चावल बांट रहे थे। लोगों से कह रहे थे कि महापड़ाव से जरूर आना। एक गांव में साधारण गली में एक बच्ची नजर आई। बच्ची को पीले चावल देकर प्रधान ने कहा कि खेजड़ी बचाने के लिए महापड़ाव में जरूर आना है। बच्ची ने चावल लेकर माथे से लगाए और कहा- मैं जरूर आऊंगा। पूरे परिवार के साथ आऊंगा। खेजड़ी के लिए अगर सिर भी कटाना पड़े तो कटा दूंगी। इतनी छोटी बच्ची के मुंह से यह बात सुन प्रधानजी गदगद हो गए। बच्ची को गोद में उठा लिया और खूब आशीर्वाद दिया। जिस राज्य में ‘सिर साठै रूख रवै, तो भी सस्तो जाण’ की भावना मासूम बच्चों में भरी हो, उसमें खेजड़ी पर कुल्हाड़ी कैसे चल सकती है? 4. चलते-चलते… पुलिस अक्सर ‘अपराधियों में भय’ भरने की मशक्कत में लगी रहती है। ऐसे में ‘आमजन में विश्वास’ भरने का काम पीछे छूट जाता है। कुछ पुलिसवाले ऐसे भी होते हैं जो खाकी को ही दागदार बना देते हैं। उनकी हरकतों से अपराधियों में विश्वास जागने लगता है और आमजन में भय। लेकिन सभी पुलिसवाले ऐसे नहीं होते। ज्यादातर अपनी ड्यूटी ईमानदारी से करते हैं और आमजन के विश्वास को बनाए रखने में योगदान देते हैं। डीडवाना थाने के इंचार्ज राजेंद्र सिंह ने तो ‘आमजन के विश्वास’ को अपनी पीठ पर उठा लिया। हुआ यूं कि डीडवाना में हाथ-पैरों से दिव्यांग नदीम ने कभी थाना अंदर से नहीं देखा था। गश्त के दौरान इंचार्ज साहब की नदीम से मुलाकात हो गई। उन्हें नदीम की इच्छा के बारे में जानकारी हुई। इसके बाद उन्होंने नदीम को थाना विजिट कराने का प्लान बनाया। नदीम को अपनी पीठ पर बैठाया और थाने का हर हिस्सा दिखाया। बल्कि थाने के हर काम की जानकारी दी। इसके बाद उसे अपनी सीट पर ले जाकर बैठाया और अपनी कैप उतारकर नदीम के सिर पर रख दी। थाना इंचार्ज की इस कोशिश ने इंसानियत की मिसाल पेश की है। इस जज्बे को सैल्यूट। इनपुट सहयोग- ऋषभ सैनी (जयपुर), भरत मूलचंदानी (अजमेर), अनुराग हर्ष (बीकानेर), हनुमान तंवर (नागौर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब मंगलवार को मुलाकात होगी…


