सलूंबर जिले में रंगों के पर्व होली की तैयारियां तेज हो गई हैं। मेवाड़ की ऐतिहासिक माटी में सदियों पुरानी ‘सिन्दोलिया’ (छोटे उपले) बनाने की परंपरा आज भी जीवंत है। ग्रामीण अंचलों में बेटियां और महिलाएं गाय के गोबर से छोटे-छोटे उपले तैयार कर रही हैं, जिन्हें होलिका दहन के लिए मालाओं में पिरोया जाएगा। गांवों के आंगनों में सुबह से ही बेटियां और महिलाएं शुद्ध गोबर से सिन्दोलिया बना रही हैं। इन उपलों के बीच में छेद कर धूप में सुखाया जाता है, ताकि बाद में इन्हें पिरोकर आकर्षक मालाएं बनाई जा सकें। यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है,बल्कि यह मेवाड़ की लोककला और सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है। बालिकाएं पारंपरिक गीत गुनगुनाते हुए हंसी-ठिठोली के बीच इस कार्य को उत्सव का रूप दे रही हैं।संस्कृति, मिताली, नेहल और विधि जैसी बालिकाओं ने बताया कि यह कला उन्हें अपनी दादी-नानी से विरासत में मिली है।आधुनिकता के दौर में भी नई पीढ़ी द्वारा इस परंपरा को सहेजना मेवाड़ की मजबूत सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाता है। स्थानीय नवयुवती मंजू चतुर्वेदी के अनुसार,फाल्गुन पूर्णिमा के दिन महिलाएं और बालिकाएं उपवास रखकर शुभ मुहूर्त में होलिका पूजन करती हैं। परंपरा के अनुसार,सेमल के पेड़ को होलिका का प्रतीक मानकर दहन किया जाता है।धार्मिक मान्यता है कि होलिका दहन में इन उपलों की मालाएं अर्पित करने से सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है।


