16 दिसंबर यानी आज के ही दिन भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान ने घुटने टेके थे। सन 1971 में लड़ी गई इस लड़ाई में छत्तीसगढ़ रायपुर के कर्नल जंग शमशेर सिंह कक्कड़ शामिल थे। पाकिस्तानी लैंड माइन की वजह से ब्लास्ट में इनका बांया पैर उड़ गया। एक ही पर पर 21 साल तक सेना की नौकरी की। कमांडो ट्रेनिंग भी की, सांप खाए, सन 1971 की लड़ाई से जुड़े दिलचस्प किस्से उन्होंने दैनिक भास्कर से साझा किया पढ़िए उन्हीं के शब्दों में। सवाल- लड़ाई में जाने की खबर कैसे मिली, क्या रिएक्शन था फैमिली का ?
जवाब- मेरे ग्रैंडफादर आर्मी में थे पंजाबी रेजीमेंट में जो अब पाकिस्तान चली गई। मेरे फादर महार रेजीमेंट में थे वह ब्रिटिश आर्मी में ऑफिसर थे । उस ट्रेडीशन के अनुसार सन 71 में ही मैंने आर्मी ज्वाइन की। मुझे कमिशन मिला। 6 महीने के बाद ही जंग छिड़ गई, मुझे जाने का मौका मिला तो पिता काफी खुश हुए। हर एक को मौका नहीं मिलता देश के लिए लड़ने का। मुझे याद आता था कि 65 की वॉर के समय रेडियो पर कान पर लगाकर हमेशा हम सुनते रहते थे कि इंडियन आर्मी और पाकिस्तान के बीच कैसे लड़ाई चल रही है। जोश आ जाया करता था। लड़ाई के वक्त मेरी डिप्लॉयमेंट जम्मू कश्मीर में उरी सेक्टर में थी, मैं बिल्कुल बॉर्डर पर ही था दुश्मन से की पोस्ट से पास ही लड़ाई लड़ी। सवाल- सर कश्मीर के उरी में आर्मी की एक पोस्ट है उसका नाम कक्कड़ पोस्ट क्यों है ?
जवाब- एक छोटी सी पहाड़ी थी। वो हिस्सा नो मैंस लैंड था। वहां आर्मी नहीं जाती थी, मगर अचानक पाकिस्तान की आर्मी ने आकर उसे कैप्चर कर लिया था। मुझे टास्क दिया गया कि उस जगह को वापस लीजिए। अब अगर हम सामने की तरफ से जाते तो दुश्मन के लिए हम सीटिंग डक होते। आराम से वो हमें गोली मार देते। हमने एक नाले के पास से जड़ों को पकड़कर चढ़ाई की। छुपकर रात के 3:00 बजे पहुंचे। पाकिस्तानी आर्मी के लोग सभी सो रहे थे । हमने इस तरह से सरप्राइज दिया कि वह नंगे नंगे पैर भागने लगे। उस जगह पर हमनें भारत का झंडा लगाया, मैंने तय किया था कि हम आधी रात लड़ाई शुरू करेंगे मेरे कमांडर काफी खुश हुए। जब हमने पोस्ट को जीत लिया तो सेना ने उस पोस्ट का नाम कक्कड़ पोस्ट रखा। आज भी वह उरी में है और इंडियन आर्मी वहां बैठकर पाकिस्तान की हरकतों पर नजर रखती है। सवाल- सर आपको ये इंजरी कैसे हुई क्या घटना थी, जिसमें आपका पैर ब्लास्ट हो गया ?
जवाब- माइन ब्लास्ट हुआ था। पाकिस्तान ने छोटी-छोटी माइंस लगाकर रखी थी। जमीन की तह के नीचे छुपाकर बम रखे जाते हैं। इसी में मेरो पैर उड़ गया। मैंने आज तक अपने आप को असहाय नहीं समझा। एक पैर पर 21 साल तक की सारे प्रमोशन लिए नौकरी की। मुझे आर्टिफिशियल पर लगाना पड़ा अब मैं इसी के साथ चलता फिरता घूमता हूं कोई दिक्कत नहीं होती। (यह बताते हुए कर्नल कक्कड़ के चेहरे पर एक मुस्कान थी, एक सैनिक ही इस परिस्थिति में मुस्कुरा सकता है)। सवाल- आप लोगों ने भेष बदला था, सांप भी खाए क्या किस्सा था वो ?
जवाब- हम पाकिस्तान के खिलाफ सीक्रेट ऑपरेशन की तैयारी कर रहे थे। कुछ यंग अफसरों को लेकर कमांडाे ट्रेनिंग दी गई थी। दाढ़ी बढ़ाकर हम रहते थे, ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान के लोग रहते हैं। हमें 5 वक्त की नमाज पढ़ना, उनके रहन-सहन के तौर तरीके सिखाए गए थे। मुश्किल वक्त में जंगल में कुछ खाने का न मिले, तो सांप को कैसे सिर काटकर, उसे खाना है ये सिखाया गया। मैंने खाया था सांप और फिश में कोई फर्क नहीं होता (ये बताकर कर्नल कक्कड़ हंसने लगे)। कक्कड़ ने आगे कहा- कमांडो ट्रेनिंग के दौरान इंदिरा गांधी भी आई थीं, उनके साथ तस्वीर खिंचवाई थी सैनिकों ने। हम इसके लिए तैयार थे कि पाकिस्तान के अंदर जाकर टास्क मिले तो वहां जाकर हम ऑपरेशन कर सकें। लेकिन इसकी जरुरत नहीं पड़ी। सवाल- लड़ाई छिड़ी होती है, क्या माहौल होता है क्या सैनिक का दिमाग में तनाव डर होता है उस समय ?
जवाब- गोली पर किसी का नाम नहीं लिखा होता, जो रास्ते में आए उसके सीने में लगेगी। हम डर-डर के जिएंगे तो लड़ेंगे कैसे। हम तो यह सोच कर रहते थे की गोली लगेगी तो लगेगी। जब आप बैटल फील्ड में होते हैं तो अगर आप यह सोचेंगे कि क्या होगा ? तो आप कभी भी अपना टास्क नहीं कर पाएंगे। फायरिंग होती थी उसके बीच हम जाते थे अपना ऑपरेशन करके लौट आते थे। बस मन में ये बात होती थी कि अब चाहे जो हो उस जगह पर हम अपने देश को धोखा नहीं दे सकते। सवाल- पाकिस्तानियों के साथ कभी कोई बातचीत हुई ?
जवाब- एक तो जब मैंने पोस्ट को वापस हासिल किया, तब सामना हुआ था। हालांकि रेडियो सेट हमारे पास भी अमेरिका थे उनके पास भी अमेरिका वाले ही थे। ताे कभी कभी फ्रीक्वेंसी मिल जाती थी। तो फिर एक दूसरे को गालियां दी जाती थी। हम तो ठहरे सिख लाइट इन्फेंट्री वाले, इधर से गलियों में कोई कमी नहीं रखते थे, पाकिस्तान के लिए। (ये पल यादकर कर्नल हंसने लगे)। सवाल- इन दिनों किस मिशन पर हैं सर ?
जवाब- रिटायरमेंट के बाद मैंने कई कॉलेज में एमबीए के बच्चों को अलग-अलग स्कूल में सॉफ्ट स्किल्स के बारे में पढ़ाया है। जैसे टाइम मैनेजमेंट, स्ट्रेस मैनेजमेंट, कम्युनिकेशन स्किल्स और मैनर्स के बारे में। कोविड के समय में मैंने काफी किताबें पढ़ीं। इन दिनों एक किताब लिख रहा हूं, जो ये बताती है कि भारतीय सामाजिक व्यवस्था में जातिवाद था ही नहीं, अंग्रेजों ने जोगों को अलग-अलग वर्गों में बांटकर कास्ट सिस्टम को लाकर फूट डाली थी।


