भास्कर न्यूज | राजिम वरिष्ठ साहित्यकार, प्रखर चिंतक और छत्तीसगढ़ी अस्मिता के सशक्त हस्ताक्षर सुशील भोले के आकस्मिक निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है। उनका जाना केवल एक रचनाकार का अवसान नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी साहित्य और वैचारिक चेतना के एक सशक्त अध्याय का अंत माना जा रहा है। भोले ने ‘मयारू माटी’ के माध्यम से छत्तीसगढ़ी पत्रकारिता को नई दिशा दी। वहीं उनकी अन्य कृतियां ‘आखर अंजोर’, ‘छितका कुरिया’, ‘भोले के गोले’, ‘दरस के साध’, ‘जिनगी के रंग’, ‘सब ओखरे संतान’, ‘सुरता के बादर’, और ‘ढेंकी’ ने प्रदेश की मूल संस्कृति, लोकचेतना और आदिधर्म की स्थापना के लिए जीवनभर संघर्ष किया। रत्नांचल जिला साहित्य व जनकल्याण समिति, गरियाबंद द्वारा आयोजित श्रद्धांजलि सभा में साहित्यकारों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। समिति के अध्यक्ष शायर जितेंद्र सुकुमार ”साहिर” ने कहा कि भोले जी हमेशा कहते थे, “छत्तीसगढ़ के इतिहास और संस्कृति को अपनी मिट्टी की नजर से देखा जाना चाहिए, न कि बाहरी चश्मे से।” उन्होंने विश्वास जताया कि भोले की कृतियां आने वाली पीढ़ियों के लिए मशाल का कार्य करेंगी। वरिष्ठ साहित्यकार जयंत साहू ने कहा कि भोले का जीवन साहित्य साधना और आत्म-साधना का अद्भुत संगम था। 14 वर्षों तक सांसारिक सुखों से दूर रहकर उन्होंने आध्यात्मिक गहराई अर्जित की, जो उनके लेखन की शक्ति बनी। अभावों और गरीबी के बीच भी उन्होंने कभी अपनी लेखनी और सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। लकवा जैसी गंभीर बीमारी से जूझते हुए भी उनकी साहित्य साधना निरंतर चलती रही। कवि संतोष कुमार सोनकर मंडल ने कहा कि भोले जी नए रचनाकारों को सदैव प्रोत्साहित करते थे और लोककला लोकसंस्कृति के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत रहते थे। कवयित्री सरोज कंसारी ने उन्हें संवेदनशील, सरल और सहज व्यक्तित्व का धनी बताते हुए कहा कि वे हमेशा नवोदित लेखकों का मार्गदर्शन करते थे। कवि गोकुल सेन, टीकमचंद सेन, संतोष सेन, कृष्ण कुमार ‘अजनबी’, फनेन्द्र मोदी ‘अश्क बस्तरी’, भोज साहू, नूतन लाल साहू, विजय कुमार सिन्हा, प्रदीप कुंवर ‘दादा’, केंवरा यदु, गोकुल साहू, राधेश्याम सेन, रेणू शर्मा, श्याम सुंदर साहू, पुरुषोत्तम चक्रधारी, राजेश साहू सहित अनेक साहित्यकारों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।


