सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार सबूतों के आधार पर फैसला लिखना गलत है। जस्टिस पी एस नरसिम्हा और आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि यह साधारण गलती नहीं हो सकती। कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 10 मार्च को होगी। दरअसल अगस्त 2023 में आंध्र प्रदेश की एक ट्रायल कोर्ट ने विवादित प्रॉपर्टी केस में AI से बनी तस्वीर के आधार पर फैसला दिया। इसके खिलाफ आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर हुई, जिसे जनवरी 2024 में खारिज कर दिया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। 17 फरवरी को भी कोर्ट ने AI टूल से तैयार पिटीशन फाइल करने के बढ़ते ट्रेंड पर चिंता जताई थी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अगर किसी फैसले का आधार नकली या गैर-मौजूद सबूत हैं तो यह गंभीर मिसकंडक्ट है। इसका सीधा असर न्याय देने की प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर पड़ता है। ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि स्पेशल लीव पिटीशन के निपटारे तक एडवोकेट-कमिश्नर की रिपोर्ट के आधार पर आगे न बढ़े। यह टिप्पणी वकीलों और न्यायपालिका दोनों के लिए चेतावनी मानी जा रही है। क्या AI के लिए नई गाइडलाइन आएगी?
सुप्रीम कोर्ट ने जवाबदेही की जांच की बात कही है। संभव है कि कोर्ट न्यायिक प्रक्रिया में AI के उपयोग को लेकर दिशा-निर्देश तय करे। बार काउंसिल की भूमिका भी अहम होगी। यदि जरूरत पड़ी तो पेशेवर आचरण के नियमों में संशोधन हो सकता है। AI और कानून: क्या ध्यान रखें 1. AI सबूत क्यों जोखिम भरे? 2. भारत में AI पर अभी क्या नियम हैं? 3. आगे क्या हो सकता है? ———- ये खबर भी पढ़ें… सुप्रीम कोर्ट का सवाल- NOTA से क्या फायदा है:क्या नेताओं की क्वालिटी सुधरी, एक ही उम्मीदवार होने पर यह जरूरी क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने 24 फरवरी को NOTA (इनमें से कोई नहीं) विकल्प की उपयोगिता और असर पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने मंगलवार को सरकार से पूछा कि इसका क्या फायदा है, क्या NOTA के आने से चुने गए नेताओं की क्वालिटी में सुधार हुआ है? कोर्ट ने कहा कि NOTA किसी भी सीट को भर नहीं सकता और इसीलिए इसका प्रभाव सीमित है। यदि किसी सीट पर सिर्फ एक ही उम्मीदवार होता है तो क्या इसके बाद भी इसकी जरूरत है? पूरी खबर पढ़ें…


