बसना ब्लॉक के ग्राम पंचायत गिधली के आश्रित ग्राम भदरपाली में आखिरकार 12 वर्षों का लंबा इंतजार खत्म हुआ। सुरंगी नाले पर 6.82 करोड़ रुपये की लागत से बहुप्रतीक्षित पुलिया निर्माण का कार्य शुरू हो गया है। इस खबर से भदरपाली और लमकेनी के ग्रामीणों में भारी उत्साह है, क्योंकि अब उन्हें जान जोखिम में डालकर नाला पार नहीं करना पड़ेगा। साल के 12 महीनों में से करीब 9 महीने इस नाले में इतना पानी रहता था कि पैदल पार करना असंभव था। यहां के ग्रामीण, महिलाएं और मासूम बच्चे टायर के ट्यूब के सहारे अपनी जान जोखिम में डालकर नाला पार करते थे। बरसात के दिनों में स्थिति और भी भयावह हो जाती थी। यदि नाले के उस पार किसी की तबीयत खराब हो जाए या कोई गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना हो, तो ग्रामीणों के हाथ-पांव फूल जाते थे। 12 सालों तक इस समस्या ने ग्रामीणों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। ग्राम पंचायत गिधली सरंपच साबित मांझी ने बताया कि निर्माण कार्य शुरु हो गया है। अब लोगों को आवागमन में दिक्कतें नहीं होगी। पुलिया के निर्माण से सबसे बड़ी राहत क्षेत्र के किसानों को मिलने वाली है। भदरपाली के लगभग 50 किसान ऐसे हैं, जिनकी 400 एकड़ से अधिक उपजाऊ कृषि भूमि नाले के उस पार लमकेनी क्षेत्र में आती है। किसान मधुसूदन पटेल बताते हैं कि खेती के हर सीजन में जूझना पड़ता था। खाद की बोरियां पहुंचानी हों या बीज, सब कुछ ट्यूब पर लादकर ले जाना पड़ता था। सबसे बड़ी चुनौती फसल कटाई के बाद आती थी। पुल न होने के कारण ट्रैक्टर या बैलगाड़ी सीधे खेत तक नहीं पहुंच पाती थी। किसानों को उपज लेकर 15 किमी का चक्कर लगाकर तुषगांव मंडी पहुंचना पड़ता था। जिसकी दूरी 2 किमी होनी थी, उसके लिए 13 किमी अतिरिक्त पड़ता था। भविष्य की ओर बढ़ता भदरपाली: आने वाले कुछ महीनों में जब यह पुलिया बनकर तैयार हो जाएगी, तो भदरपाली और लमकेनी के बीच की भौगोलिक दूरी के साथ-साथ दिलों की दूरी भी कम होगी। यह पुल क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ाएगा और किसानों को आत्मनिर्भर बनाएगा। पुलिया का अभाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं था। भदरपाली के बच्चे जो आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे गांवों या शहरों पर निर्भर हैं, उन्हें बारिश के दिनों में अक्सर अपनी स्कूल की छुट्टियां करनी पड़ती थीं। इसी तरह स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच भी इस नाले ने रोक रखी थी। कई बार आपातकालीन परिस्थितियों में एम्बुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती थी और मरीजों को खाट पर लादकर नाला पार कराना पड़ता था।


