शहर में संचालित जनजाति विकास विभाग के तीन खेल छात्रावासों में बच्चों को खेलों में आगे बढ़ाने के उद्देश्य से लाया गया है, लेकिन यहां खेल संबंधी सुविधाओं का अभाव नजर आता है। कुछ सीमित स्पोर्ट्स एक्टिविटी को छोड़ दें तो बच्चों के खेल विकास पर अपेक्षित फोकस नहीं दिख रहा। भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि तीनों छात्रावासों के हालात कमोबेश एक जैसे हैं। हॉकी की छात्राओं को पिछले दो वर्षों से नई हॉकी स्टिक तक उपलब्ध नहीं
यहां चयनित 75 छात्राएं हॉकी, एथलेटिक्स और तीरंदाजी की तैयारी के लिए रह रही हैं। स्थिति यह है कि हॉकी की छात्राओं को पिछले दो वर्षों से नई हॉकी स्टिक तक उपलब्ध नहीं करवाई गई, जबकि नई स्टिक थैलियों में पैक रखी हैं। जिम लंबे समय से बंद पड़ा है और उसमें सामान व कबाड़ भरा हुआ है। पड़ताल में यह भी सामने आया कि छात्राओं को दो साल से न जूते मिले हैं और न ट्रैक सूट। वार्डन, प्रभारी और कोच की जिम्मेदारी फिलहाल एक ही शिक्षिका के भरोसे है। तीरंदाजी कोच के रूप में शारीरिक शिक्षिका को लगाया गया है, जबकि नियमानुसार भारतीय खेल प्राधिकरण से चयनित प्रशिक्षक होना आवश्यक है। प्रभारी, कोच एवं वार्डन यशोदा तिवारी ने बताया कि फिलहाल खेल मैदान उपलब्ध नहीं है। छात्राओं को मीरा कन्या महाविद्यालय के एक मैदान पर अभ्यास करवाया जाता है। एस्ट्रोटर्फ दूर होने के कारण छात्राओं को रोजाना वहां लाना-ले जाना संभव नहीं हो पाता। तीरंदाजी में छात्राओं की संख्या अधिक है, लेकिन सीमित कमानों के जरिए अभ्यास कराया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि शारीरिक शिक्षिका निशा पंड्या, जिन्हें तीरंदाजी कोच के रूप में डेपुटेशन पर लगाया गया है, वे स्वयं को एथलेटिक्स कोच भी बताती हैं। छात्रावास के रसोईघर की दीवारों पर सीलन और पपड़ी दिखाई दे रही है। रसोई से सटे भोजन कक्ष की छत उधड़ने लगी है और एक हिस्सा जर्जर हो चुका है। सरदारपुरा बालक खेल एकेडमी: सिंथेटिक वॉलीबॉल ट्रैक पर बिना जूतों के अभ्यास
बालक खेल एकेडमी के प्रवेश द्वार पर गंदगी नजर आई। बच्चे वॉलीबॉल का अभ्यास कर रहे थे, लेकिन उनके पास न जूते थे और न ट्रैक सूट। कोच अतुल चौधरी कोर्ट की बजाय एक कक्ष में बैठे मिले। यहां करीब 50 बच्चे अभ्यास करते पाए गए। रसोई में मौजूद खाना बनाने वाले आशाराम और कमलेश ने बताया कि उन्हें तीन माह से मानदेय नहीं मिला है। उनका कहना है कि यदि यही स्थिति रही तो वे काम छोड़ने पर मजबूर होंगे। वार्डन जसवंत मेघवाल ने बताया कि यहां खिलाड़ियों के अभ्यास के लिए जिम, लाइब्रेरी और कंप्यूटर रूम उपलब्ध नहीं हैं। उनके अनुसार, प्रत्येक खिलाड़ी को जूते और ट्रैक सूट के लिए सालाना 3600 रुपए दिए जाते हैं। पिछले वर्ष सितंबर में प्रतियोगिता के दौरान सभी खिलाड़ियों को ड्रेस उपलब्ध करवाई गई थी। भवन जर्जर होने लगा है, जिसका प्रस्ताव विभाग को भेजा जा चुका है। खेलगांव बालक एकेडमी: कोचिंग व्यवस्था में खामियां
खेलगांव में संभागभर के 74 बच्चे रह रहे हैं। यहां हॉकी, तीरंदाजी, वॉलीबॉल और एथलेटिक्स की तैयारी करवाई जाती है। यहां भी बच्चों को जूते और ट्रैक सूट उपलब्ध नहीं मिले। जिम बिना उपयोग के जंग खा रहा है। हॉकी के लिए खेल विभाग ने संविदा पर कोच नियुक्त की है, जो नियमित अभ्यास करवाती हैं। वॉलीबॉल कोच नंदिनी गुर्जर केवल शाम के समय अभ्यास कराती हैं। तीरंदाजी कोच रेणु मीणा नियमित कोचिंग नहीं करवा रहीं, जबकि एथलेटिक्स कोच नरेंद्र चौहान पिछले एक वर्ष से डेपुटेशन पर हैं, लेकिन ट्रैक के अभाव में अब तक कोचिंग शुरू नहीं हो सकी है। छात्रावास के पीछे बना नाला बदबू के कारण बच्चों को परेशान करता है। रसोई में कार्यरत कुक को भी तीन माह से मानदेय नहीं मिला है। बच्चों के कमरों की अलमारियां टूटी हुई हैं और दीवारों पर सीलन व पपड़ी उखड़ रही है। वार्डन सुंदरलाल लोलावत का कहना है कि समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। बयान टीएडी उपायुक्त निरमा बिश्नोई ने बताया कि मधुबन स्थित भवन में छत का कार्य जल्द शुरू कराया जाएगा। इसके अलावा जहां-जहां कमियां हैं, उन्हें शीघ्र दूर करने का प्रयास किया जाएगा।


