कानपुर शिवराजपुर के दुर्गापुर के बलिदान हुए सैन्य कर्मी पवन यादव का पार्थिव शरीर आज सोमवार को उनके पैतृक गांव पहुंच सकता है। कोहरा और धुंध की वजह से स्पेशल विमान को आने में देरी हो रही है। इधर परिवार के लोगों का तीन दिन से रो-रो कर बुरा हाल है। पत्नी और मां के साथ बच्चे भी रोते-रोते बदहवास हो गए हैं। सैन्य कर्मी के परिवारीजन, नजदीकी और गांव के सैकड़ों लोग भीषण ठंड में भी घर के बाहर डेरा डाले हुए हैं। पत्नी और मां रोते-रोते अचेत हुईं, बच्चे पापा की तस्वीर लेकर बिलखते रहे उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा में शनिवार दोपहर सेना का एक ट्रक खाई में गिरने से शिवराजपुर के दुर्गापुर गांव में रहने वाले सेना के जवान पवन यादव (35) की मौत हो गई थी। मामले की जानकारी मिलने के बाद से ही प्रयागराज में रहने वाली पत्नी सुषमा, 11 साल का बेटा तेजस और 8 साल की बेटी तनवी शिवराजपुर के पैतृक निवास पहुंच गए। इधर शिवराजपुर में पिता सतेंद्र यादव, मां गोमती, भाई पारस और व नीलेंद्र यादव मौत की खबर मिलने के बाद से बदहवास हैं। पवन के बलिदान होने की जानकारी मिलते ही गांव के सैकड़ों लोग घर पहुंच गए तो नजदीकी और रिश्तेदार भी शनिवार देर रात से लेकर रविवार दोपहर तक पहुंच गए। पत्नी, मां और पिता के साथ ही परिवार के सभी लोग रो-रो कर बेहाल हैं। बातचीत के दौरान पापा की हाथ में फोटो लिए बेटा तेजस फफक-फफक कर रोने लगा। पापा रोज हमसे और बिट्टी (तनवी) से वीडियो कॉल पर बात करते थे। पापा ने कहा था कि हम जल्दी खिचड़ी पर आने वाले हैं, ठंड है तुम सभी लोग अपना ध्यान रखना और पढ़ाई करना। अगर मुझे पता होता कि ऐसा कुछ होने वाला है तो पापा को जाने ही नहीं देता या तो न्यू ईयर पर घर बुला लेता। जब हादसा हुआ तो उससे पहले पापा ने वीडियो कॉल किया था, तनवी से बात की थी। तब मम्मी कैंटीन में सामान लेने गई थीं। वहीं दूसरी तरफ पत्नी बार-बार रोते हुए अचेत हो जा रही थी। परिवार के लोग उन्हें संभालने में लगे थे। सुषमा बार-बार रोते हुए यही कह रही थीं कि मेरा तो सबकुछ लुट गया, सब बर्बाद हो गया। अब किसके सहारे जिऊंगी, मुझे अकेला छोड़कर क्यूं चले गए। भगवान मुझसे क्या गलती हो गई तो मेरा घर उजाड़ दिया। पत्नी को इस तरह रोते हुए देखकर गांव के लोगों की भी आंखे नम हो गईं। सिर्फ पवन ही नहीं पूरे गांव में तीन दिन से मातम छाया हुआ है। पिता बोले-दोनों बेटों को भी सेना में भेजेंगे पवन के बलिदान के बाद भी पिता का हौसला नहीं टूटा, भले ही उनकी आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। जुबान लड़खड़ा रही थी, लेकिन यही कह रहे थे कि हमाओ लल्ला पवन शुरू से बहुत फुर्तीला रहा और 2009 में पहली बार में ही सेना में भर्ती हो गया था। पवन का जब भी फोन आओ तो मेरा हाल जरूर लेता था। पिता की डबडबाती आंखाें और लड़खड़ाती जुबान भी हौसला नहीं तोड़ सकी और उन्होंने कहा कि वह अपने दोनों छोटे बेटों को भी देश सेवा के लिए सेना में भेजना चाहते हैं। अगर मौका मिला तो दोनों बेटों को भी सेना में भेजेंगे।


