राज्य बनने के 25 साल बाद भी नगर सेना में पदस्थ महिला कर्मचारी अपने अधिकारों व सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही हैं। इतने साल बाद भी उन्हें 6 माह का मातृत्व अवकाश नहीं मिल पाया है। जबकि केंद्र सरकार से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इसे महिलाओं का अधिकार मान चुका है। इसे लागू करने के लिए कई बार प्रस्ताव भेजे गए। पिछले एक साल में डिप्टी सीएम से दो बार फाइल शासन के पास गई। इसकी समीक्षा भी हुई, लेकिन वित्त विभाग से अनुमति नहीं मिलने के कारण फाइल वापस लौटा दी गई। नतीजा यह है कि आज तक नगर सैनिक महिलाओं के लिए 6 माह के मातृत्व अवकाश का प्रावधान लागू नहीं हो पाया है। इसका सीधा असर महिला कर्मचारियों पर पड़ रहा है। बच्चों की देखभाल के लिए उन्हें मजबूरन नो वर्क-नो पेमेंट का विकल्प चुनना पड़ता है। यानी नौकरी भी बचानी है और बिना वेतन के गुजारा भी करना है।अधिकारियों के मुताबिक राज्य गठन के बाद वर्ष 2000 में नगर सेना का गठन हुआ था। यह गृह विभाग के अधीन काम करता है। शुरुआत में बल की संख्या 5 हजार थी। वर्तमान में राज्य में करीब 9 हजार नगर सेना के कर्मचारी पदस्थ हैं। इसमें तकरीबन 2600 महिला कर्मचारी हैं। आपबीती: बिना वेतन के चल रहा घर
अपनी मांगों को लेकर खुलकर आवाज भी नहीं उठा पातीं। क्योंकि नौकरी जाने का डर बना रहता है। 8 माह पहले उनकी डिलिवरी हुई। तबीयत बिगड़ने के कारण एक माह पहले ही छुट्टी लेनी पड़ी। डिलिवरी के बाद सिर्फ दो माह की छुट्टी मिली। इसके बाद नो पेमेंट, नो वर्क पर घर बैठना पड़ा। पिछले 6 माह से बिना वेतन घर चल रहा है। पति प्राइवेट नौकरी करते हैं। आय सीमित है। छोटे बच्चे की देखभाल करने वाला कोई नहीं है। मजबूरी में नौकरी से दूर रहना पड़ रहा है। कोरबा और बिलासपुर में पदस्थ अन्य महिला कर्मचारियों ने भी इसी तरह की परेशानियां बताई हैं।
-जैसा कि छात्रावास में पदस्थ महिला नगर सैनिक ने भास्कर को बताया। आपबीती: बिना वेतन के चल रहा घर
अपनी मांगों को लेकर खुलकर आवाज भी नहीं उठा पातीं। क्योंकि नौकरी जाने का डर बना रहता है। 8 माह पहले उनकी डिलिवरी हुई। तबीयत बिगड़ने के कारण एक माह पहले ही छुट्टी लेनी पड़ी। डिलिवरी के बाद सिर्फ दो माह की छुट्टी मिली। इसके बाद नो पेमेंट, नो वर्क पर घर बैठना पड़ा। पिछले 6 माह से बिना वेतन घर चल रहा है। पति प्राइवेट नौकरी करते हैं। आय सीमित है। छोटे बच्चे की देखभाल करने वाला कोई नहीं है। मजबूरी में नौकरी से दूर रहना पड़ रहा है। कोरबा और बिलासपुर में पदस्थ अन्य महिला कर्मचारियों ने भी इसी तरह की परेशानियां बताई हैं।
-जैसा कि छात्रावास में पदस्थ महिला नगर सैनिक ने भास्कर को बताया। महिला का संवैधानिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट
मातृत्व अवकाश केवल एक सुविधाजनक छूट नहीं, बल्कि यह महिला का संवैधानिक अधिकार है। जो उनके सम्मान, स्वास्थ्य, निजता और समान अधिकारों से जुड़ा है। इस निर्णय में कहा गया कि इसे पहले-दूसरे या तीसरे बच्चे तक सीमित करना गलत है, और इसे जीवन के मौलिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए। केंद्र का नियम: 6 माह मातृत्व अवकाश जरूरी
मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 को 2017 में केंद्र सरकार ने संशोधित किया है। इसके अंतर्गत सरकारी कर्मचारियों को 180 दिन (6 माह) का भुगतान योग्य मातृत्व अवकाश मिलता है। यदि वे पिछले 12 महीनों में न्यूनतम 180 दिनों तक सेवा में रही हैं। यह उनका अधिकार है। भास्कर एक्सपर्ट – जूही मारोठिया, एडवोकेट, काउंसलर,साइकोलॉजिस्ट महिलाओं का यह अधिकार
मातृत्व अवकाश हर महिला का अधिकार है। राज्य की महिला कर्मचारियों को अधिकतम 180 दिन यानी 6 माह का सवैतनिक मातृत्व अवकाश देने का प्रावधान है। इसमें प्रसव पूर्व और प्रसवोत्तर अवधि शामिल होती है। यह अवकाश सामान्य छुट्टियों से नहीं काटा जाता और जरूरत पड़ने पर अन्य छुट्टियां भी जोड़ी जा सकती हैं। लेकिन नगर सेना की महिलाएं आज भी इस अधिकार से वंचित हैं। वर्दी पहनकर ड्यूटी करने वाली ये महिलाएं कानून-व्यवस्था संभालती हैं, पर अपने ही जीवन की सबसे जरूरी घड़ी में सिस्टम उनसे मुंह मोड़ लेता है। उनके लिए मातृत्व खुशी से ज्यादा संघर्ष बन गया है।


