हत्याकांड का मामला:15 को दोस्त की शादी में जमकर नाचा मोनू, 18 को उम्रकैद और 23 को मौत

कभी खुशी-कभी गम… यह कहावत नदबई के चर्चित विजयपाल हत्याकांड के दोषी मोहित उर्फ मोनू की जिंदगी पर सटीक बैठती दिखी। 15 फरवरी को लगन समारोह में डांस करता नजर आया युवक, 18 फरवरी को अदालत से उम्रकैद की सजा पाता है और 23 फरवरी को अस्पताल में उसकी मौत हो जाती है। सेवर सेंट्रल जेल में बंद आजीवन कारावास की सजा काट रहे 30 वर्षीय मोनू उर्फ मोहित की तबीयत 21 फरवरी को अचानक बिगड़ी, जिसके बाद उसे भरतपुर के आरबीएम अस्पताल में भर्ती कराया गया। देर रात इलाज के दौरान उसने दम तोड़ दिया। जेलर रणवीर सिंह के अनुसार सजा सुनाए जाने के बाद से ही मोहित की मानसिक स्थिति असामान्य बताई जा रही थी। वह अजीब व्यवहार करने लगा था। उसे अस्पताल भेजा गया, जहां उपचार के दौरान मौत हो गई। वहीं मामले में परिजनों का कहना है कि सजा से पहले वह पूरी तरह सामान्य था। 12 जनवरी 2020 को हुई थी हत्या नदबई कस्बे में 12 जनवरी 2020 की शाम करीब 7 बजे मांझी निवासी विजयपाल सिंह अपने साथियों के साथ थाने के सामने स्थित मिष्ठान भंडार पर मिठाई खरीद रहे थे। तभी आधा दर्जन हमलावरों ने ताबड़तोड़ फायरिंग कर उनकी हत्या कर दी। मृतक के भाई जयपाल सिंह की रिपोर्ट पर मामला दर्ज हुआ। जांच के बाद पुलिस ने मोहित उर्फ मौनू, योगेंद्र मास्टर, रोहतान सिंह समेत अन्य के खिलाफ चालान पेश किया। सुनवाई के बाद अदालत ने 18 फरवरी को मोहित और योगेंद्र को आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जबकि हिमांशु को फरार घोषित किया। मृतक मोहित उर्फ मोनू को इसी माह 18 फरवरी को कोर्ट ने उम्र कैद की सजा सुनाई थी लेकिन उसके 6 दिन बाद ही उसकी मौत पर परिजन में नाराजगी है उसके पीछे उसकी मां ही बची हैं। भास्कर इनसाइट हाई-सिक्योरिटी का दावा, लेकिन विवादों से घिरी जेल दो साल में कई कैदियों ने तोड़ा दम…शहर की सेवर सेंट्रल जेल को प्रदेश की हाई-प्रोफाइल और सुरक्षित जेलों में गिना जाता है, लेकिन पिछले दो वर्षों में यहां हुई कैदियों की मौतों और सुरक्षा कई चूक व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े करती हैं। उम्रकैद की सजा काट रहे हिस्ट्रीशीटर से लेकर हाल ही में दोषी ठहराए गए कैदी तक लगातार सामने आए मामलों ने जेल प्रशासन, स्वास्थ्य सुविधाओं और निगरानी तंत्र की कार्यप्रणाली को कटघरे में ला दिया है। मौत के पीछे बताए जा रहे कारण… जेल प्रशासन और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, लंबी सजा या उम्रकैद के फैसले के बाद कई कैदी गहरे मानसिक तनाव और अवसाद में चले जाते हैं। मोहित उर्फ मोनू का मामला इसका ताजा उदाहरण माना गया। जेल की प्राथमिक चिकित्सा पर भी संदेह है।

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