हरदा में शुक्रवार को बसंत पंचमी का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। शहर के सरस्वती शिशु मंदिर में विद्यारंभ संस्कार का आयोजन किया गया, जिसमें नन्हें बच्चों ने अपने माता-पिता के साथ मां सरस्वती का पूजन किया। विद्यालय में मां सरस्वती की पूजा-अर्चना के बाद हवन कुंड में आहुतियां दी गईं। इस दौरान छोटे बच्चों ने भी अपने माता-पिता के साथ यज्ञवेदी में आहुति डाली, जिसका दृश्य मनमोहक था। हिंदू संस्कृति में गर्भाधान से लेकर अंतिम संस्कार तक 16 संस्कारों का विशेष महत्व है। इनमें विद्यारंभ संस्कार का भी अपना स्थान है, जो बच्चों की शिक्षा की शुरुआत का प्रतीक है। प्राचार्य बोले- संस्कारों का होना अनिवार्य
विद्यालय के प्राचार्य राजेंद्र तिवारी ने विद्यारंभ संस्कार, समर्पण, मां सरस्वती पूजन और नई शिक्षा नीति के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि माता-पिता के लिए उनकी संतान ही उनकी वास्तविक पूंजी होती है। उन्होंने अभिभावकों से शिशु के विकास में सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया और कहा कि केवल विद्यालय पर जिम्मेदारी छोड़कर इतिश्री नहीं करनी चाहिए। शिक्षा के साथ संस्कारों का होना भी अनिवार्य है। प्राचार्य तिवारी ने बताया कि विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान से संबद्ध हजारों सरस्वती शिशु मंदिर और संस्कार केंद्र चलाए जा रहे हैं। इन केंद्रों में पढ़ाई-लिखाई के अलावा संस्कारों पर विशेष महत्व दिया जाता है। इस अवसर पर विद्यालय के आचार्य, दीदियां और बच्चों के अभिभावक मौजूद रहे। यह सोलह संस्कारों में से नौवां संस्कार
विद्यालय के आचार्य मिलिंद सूबेदार ने भारतीय संस्कृति में विद्यारंभ संस्कार के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह सोलह संस्कारों में से नौवां संस्कार है। अपने उद्बोधन में उन्होंने विद्या और शिक्षा के अंतर को समझाते हुए कहा कि विद्या बच्चों में आध्यात्मिक शक्ति का विकास करती है, जो उन्हें निरंतर प्रगति की ओर ले जाती है। विद्या आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है, जिससे व्यक्ति अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। आचार्य सूबेदार ने आगे कहा कि शिक्षा केवल भौतिक संसाधनों को प्राप्त करने का माध्यम है, जबकि विद्या का उद्देश्य कहीं अधिक व्यापक है। देखिए तस्वीरें…


