राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेश में ओल्डएज होम्स (वृद्धाश्रमों) की स्थिति को लेकर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि वृद्धाश्रमों का अस्तित्व मात्र औपचारिक नहीं हो सकता, बल्कि वहां रहने वाले बुज़ुर्गों को सम्मान, चिकित्सा, सुरक्षा और मानवीय गरिमा के साथ जीवन मिलना चाहिए। जस्टिस पुष्पेन्द्र सिंह भाटी और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने यह टिप्पणी लोक उत्थान संस्थान की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए की। अदालत ने कहा कि भारतीय सभ्यता में बुज़ुर्गों को ईश्वर तुल्य माना गया है। लेकिन बदलते सामाजिक ढांचे, संयुक्त परिवारों के टूटने और शहरीकरण के कारण आज वही बुज़ुर्ग असहाय और उपेक्षित होते जा रहे हैं। कोर्ट ने कहा- वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल अब केवल पारिवारिक नैतिकता नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है। जनहित याचिका में वृद्धाश्रमों की बदहाल स्थिति को लेकर सवाल उठाए गए थे। 2046 तक देश में बुजुर्गों की संख्या बच्चों से ज्यादा होगी
अदालत ने कहा कि देश में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके लिए हमारा सिस्टम तैयार नहीं है। कोर्ट ने देश की जनसांख्यिकी स्थिति को ‘खतरे की घंटी’ बताया। अदालत ने विभिन्न रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए कहा- 2022 में बुज़ुर्ग आबादी लगभग 10.5 प्रतिशत थी। जो 2050 तक बढ़कर 20 प्रतिशत से अधिक हो सकती है। देश में 2046 तक बुज़ुर्गों की संख्या बच्चों से भी ज़्यादा होगी। ऐसे में अगर अभी से ठोस व्यवस्था नहीं की गई, तो भविष्य में यह स्थिति सामाजिक संकट का रूप ले सकती है। वृद्धाश्रमों के निरीक्षण के निर्देश
सुनवाई को दौरान सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि राजस्थान में फिलहाल 31 वृद्धाश्रम संचालित हो रहे हैं। इस पर अदालत ने कहा कि केवल वृद्धाश्रम होना ही पर्याप्त नही है, वहां बुजुर्गों के लिए किस तरह की व्यवस्था है, यह देखना भी जरूरी हैं। हाईकोर्ट ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को 15 फरवरी तक प्रदेशभर में संचालित वृद्धाश्रम का निरीक्षण करके रिपोर्ट सब्मिट करने के निर्देश दिए। रिपोर्ट में वृद्धाश्रम की बिल्डिंग, चिकित्सा सुविधा, भोजन, स्वच्छता, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की जानकारी शामिल करने के भी निर्देश कोर्ट ने दिए हैं।


