भास्कर न्यूज | धालभूमगढ़ रोजगार सृजन और किसानों की आय बढ़ाने के नाम पर चलाई गई मनरेगा की बांस खेती योजना धालभूमगढ़ प्रखंड में पूरी तरह फेल साबित हुई है। लाखों रुपए खर्च होने के बावजूद किसानों के खेतों में एक भी बांस का पौधा जीवित नहीं बचा। योजना के नाम पर करीब 1 करोड़ 40 लाख रुपए खर्च कर दिए गए, लेकिन धरातल पर न तो बांस दिख रहा है और न ही उत्पादन का कोई अता-पता। जानकारी के अनुसार, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत वर्ष 2023-24 में बांस उत्पादन योजना शुरू की गई थी। प्रखंड के 11 पंचायतों में 227 किसानों की एक-एक एकड़ जमीन पर बांस की खेती कराने का लक्ष्य तय किया गया। प्रत्येक लाभुक को करीब 180 बांस के पौधे (चारा) दिए गए। सूखे पौधे बांटे, खेतों में नहीं बचा एक भी बांस : सूत्रों के मुताबिक, इस योजना की मॉनिटरिंग तत्कालीन उप विकास आयुक्त मनीष कुमार ने की थी। पौधों की आपूर्ति रांची की एजेंसी ‘ग्रीन गार्डन’ को सौंपी गई। एजेंसी द्वारा असम से बांस के पौधे लाकर प्रखंड को उपलब्ध कराए गए, लेकिन लाभुकों का आरोप है कि जो पौधे उन्हें दिए गए, वे पहले से ही सूखे हुए थे। किसानों ने जैसे-तैसे उन्हें अपने खेतों में लगाया, मगर एक भी पौधा जीवित नहीं रह सका। देखते ही देखते सभी पौधे सूख गए। योजना का फेज-वन पूरी तरह से फेल हो गया। मजदूरी मिली, लेकिन उत्पादन शून्य : दस्तावेजों के अनुसार 11 पंचायतों में मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराने के नाम पर 74 लाख 28 हजार 134 रुपए खर्च किए गए। वहीं, सामग्री मद में 64 लाख 35 हजार 219 रुपए खर्च दर्शाए गए हैं। इसमें खाद और घेराबंदी का खर्च शामिल है। कागजों में बांस से घेराबंदी और खाद वितरण का उल्लेख है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि खेतों में न बांस बचा है और न ही घेराबंदी का कोई नामोनिशान है। किसानों का आरोप है कि बागवानी से पहले घटिया किस्म की खाद दी गई, जिससे पौधे पनप ही नहीं सके। करीब 1.40 करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद जब एक भी बांस का उत्पादन नहीं हुआ, तो पूरी योजना पर सवाल खड़े हो गए हैं। क्या सूखे पौधों की सप्लाई की जांच हुई? क्या एजेंसी की जवाबदेही तय की गई? मॉनिटरिंग के बावजूद इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हो गई? स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सिर्फ योजना की विफलता नहीं, बल्कि सरकारी धन की खुली बर्बादी और संभावित लूट का मामला है। रोजगार के नाम पर पैसे खर्च हुए, लेकिन किसानों को दीर्घकालिक लाभ देने वाली बांस खेती धरातल पर शून्य साबित हुई। अब जरूरत है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच हो, एजेंसी की भूमिका की पड़ताल की जाए और दोषियों पर कार्रवाई हो। वरना मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना की साख पर सवाल उठते रहेंगे और किसानों का भरोसा तंत्र से उठ जाएगा। इस पूरे मामले में जब धालभूमगढ़ प्रखंड के मनरेगा बीपीओ अजय कुमार से पक्ष जानने की कोशिश की गई तो उन्होंने साफ कहा कि मैं बयान देने के लिए अधिकृत नहीं हूं, इसलिए इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। बीपीओ के इस जवाब ने मामले को और संदेहास्पद बना दिया है। करोड़ों रुपए खर्च होने और जमीन पर शून्य परिणाम आने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी का बयान देने से इनकार करना कई सवाल खड़े करता है। आखिर जब योजना फेल हो चुकी है तो जवाबदेही कौन तय करेगा?


