100 से ज्यादा केसों में वर्चुअल पेशी की मंजूरी:नेक्सा एवरग्रीन मामला में हाईकोर्ट ने पूछा- ‘हर प्रोडक्शन वारंट पर 5-7 पुलिसकर्मी भेजना कहां तक सही?’

राजस्थान हाईकोर्ट ने नैक्सा एवरग्रीन एनर्जी मामले में आरोपियों को लंबित केसों में वीडियो कॉन्फ्रेसिंग के माध्यम से पेश होने की अनुमति दी है। कोर्ट ने ये आदेश रणवीर सिंह उर्फ रणवीर बिजारणिया व अन्य की क्रिमिनल रिट याचिका पर सुनवाई के बाद पारित किया। जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा कि जब तकनीक के माध्यम से सुरक्षित और प्रभावी न्यायिक संवाद संभव है, तो केवल औपचारिक पेशी के लिए बार-बार पुलिस बल और सार्वजनिक संसाधनों का भारी इस्तेमाल करना न तो प्रशासनिक रूप से व्यावहारिक है और न ही वित्तीय दृष्टि से उचित। 100 से ज्यादा FIR और व्यावहारिक चुनौतियां सीकर निवासी रणवीर सिंह, सुभाष चंद्र बिजारणिया, अमरचंद ढाका और ओमेंद्र कुमार ने कोर्ट याचिका लगाई थी। उन्होंने दलील दी कि वे ‘नैक्सा एवरग्रीन एनर्जी’ सहित कुछ व्यावसायिक संस्थाओं से जुड़े कथित निवेश और रियल एस्टेट सौदों के कारण राजस्थान के विभिन्न जिलों में दर्ज 100 से ज्यादा एफआईआर का सामना कर रहे हैं। इनमें से कई मामलों में चार्ज शीट दाखिल हो चुकी है और ट्रायल जारी है, जबकि कुछ अभी जांच में हैं। याचिकाकर्ताओं के वकील ने पक्ष रखा कि अलग-अलग जिलों के न्यायालयों में लगातार व्यक्तिगत उपस्थित होने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूल्स का हवाला दिया एकलपीठ ने आदेश में राजस्थान के ‘वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूल्स, 2021’ का हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियम 3(i) के अनुसार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा का उपयोग न्यायिक कार्रवाई के सभी चरणों में किया जा सकता है। अदालत ने ये टिप्पणियां की कानूनी मान्यता: वीसी के माध्यम से संचालित सभी कार्यवाहियां कानून की नजर में ‘न्यायिक कार्यवाही’ मानी जाएंगी। अनुशासन और शिष्टाचार: वर्चुअल कोर्ट में भी वही शिष्टाचार, गरिमा और प्रोटोकॉल लागू होंगे जो एक भौतिक अदालत में होते हैं। नियम 6 की व्याख्या: सामान्यतः हर केस में वीसी के लिए अलग आवेदन देना होता है, लेकिन याचिकाकर्ताओं पर दर्ज मुकदमों की बड़ी संख्या को देखते हुए कोर्ट ने माना कि हर केस में अलग फॉर्म भरना प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से बोझिल और अव्यावहारिक बना देगा। अदालत ने अपने पर्यवेक्षी अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए इन विशेष परिस्थितियों में याचिकाकर्ताओं को सभी लंबित ट्रायल में वीसी के जरिए पेश होने की सामान्य अनुमति दे दी। कोर्ट के सवाल: “सिर्फ फॉर्मल प्रोडक्शन के लिए ट्रांजिट क्यों?” जस्टिस फरजंद अली ने आदेश में उन व्यावहारिक और वित्तीय पहलुओं पर टिप्पणी की, जो आरोपी की भौतिक पेशी से जुड़े हैं। कोर्ट ने पूछा कि क्या मात्र औपचारिक हाजिरी दर्ज करने के लिए हर बार 5 से 7 पुलिसकर्मियों को तैनात करना न्यायसंगत है? कोर्ट ने इन सात बिंदुओं के जरिए व्यवस्था पर पड़ने वाले ‘संस्थागत दबाव’ को समझाया: कानून-व्यवस्था ड्यूटी पर असर: हर पेशी के लिए सशस्त्र पुलिसकर्मियों की एक एस्कॉर्ट टीम तैनात करनी पड़ती है। इससे पुलिस बल अपने नियमित कार्यों (जैसे क्राइम इन्वेस्टिगेशन और कानून-व्यवस्था बनाए रखना) से लंबे समय तक दूर रहता है। राजकोष पर भारी वित्तीय बोझ: आरोपियों के अंतर-जिला या अंतर-राज्यीय ट्रांजिट में सरकारी वाहनों, ईंधन, टोल टैक्स, पुलिसकर्मियों के दैनिक भत्ते और भोजन-ठहरने के इंतजाम पर जनता की गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च होता है। सुरक्षा जोखिम और मानवीय संकट: लंबी दूरी की यात्रा के दौरान कैदियों के भागने की संभावना, उन पर हमले का खतरा या रास्ते में होने वाली कोई ‘मेडिकल इमरजेंसी’ पुलिस और प्रशासन के लिए बड़ी सुरक्षा चुनौती पैदा करती है। न्यायिक प्रक्रिया में देरी: अक्सर एस्कॉर्ट उपलब्ध न होने या समन्वय की कमी के कारण आरोपी समय पर कोर्ट नहीं पहुंच पाता। इससे सुनवाई टालनी पड़ती है, जो ‘त्वरित न्याय’ के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है। जेल और कोर्ट प्रशासन के बीच कॉर्डिनेशन जटिल: सैकड़ों मामलों में अलग-अलग तारीखों पर प्रोडक्शन वारंट जारी होने से जेल अधिकारियों के लिए लॉजिस्टिक्स का प्रबंधन करना और वारंट्स के बीच प्राथमिकता तय करना एक प्रशासनिक दुःस्वप्न बन जाता है। आरोपी और वकील के बीच संवाद में बाधा: बार-बार जेल बदलने या ट्रांजिट में रहने के कारण आरोपी अपने वकील से सही परामर्श नहीं कर पाता। पर्यावरणीय और बुनियादी ढांचे की लागत: सैकड़ों गाड़ियों के सड़कों पर दौड़ने से न केवल कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है, बल्कि जेलों और अदालतों के बुनियादी ढांचे पर भी अनावश्यक दबाव डालता है, जबकि ‘ई-कोर्ट’ ढांचे के तहत डिजिटल माध्यम से इसे आसानी से टाला जा सकता है। न्यायालय ने इन सभी बिंदुओं को आधार मानते हुए स्पष्ट किया कि जब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम, 2021 के तहत एक कानूनी और सुरक्षित विकल्प मौजूद है, तो पुरानी और बोझिल व्यवस्था पर टिके रहना तर्कसंगत नहीं है। जेल प्रशासन को निर्देश हाईकोर्ट ने आरोपियों की याचिका मंजूर करते हुए निर्देश दिया कि संबंधित जेल अधिकारी, जिनकी कस्टडी में याचिकाकर्ता हैं, वे ट्रायल कोर्ट की मांग पर वीसी की सुविधा उपलब्ध कराना सुनिश्चित करें। कोर्ट ने उम्मीद जताई कि इस आदेश का अक्षरशः पालन किया जाएगा, ताकि न्याय की राह में कोई बाधा नहीं आए।

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