103 साल पुराने चांटीडीह मेले से झूले-सर्कस गायब, यादें शेष

सिटी रिपोर्टर | बिलासपुर न्यायधानी की पहचान और आस्था का प्रतीक चांटीडीह का ऐतिहासिक महाशिवरात्रि मेला अब धीरे-धीरे अपनी रौनक खोता जा रहा है। 1923 में बने प्राचीन शिव मंदिर का यह मेला कभी जिले का सबसे बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन था। उस समय महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक और मेले का आनंद लेने एक लाख से अधिक श्रद्धालु मंदिर आते थे, अब वही भीड़ घटकर करीब 10 हजार रह गई है। पहले मंदिर परिसर के बाहर फैले मैदानों में मेला दूर-दूर तक नजर आता था। 400 से ज्यादा दुकानें, ऊंचे-ऊंचे झूले, मौत का कुआं, सर्कस और खिलौनों की कतार हर उम्र के लोगों को लुभाती थी। गांव-गांव से लोग बैलगाड़ी और साइकिल से पहुंचते थे, और रातभर भजन-कीर्तन के साथ मेला चलता था। लेकिन समय ने सब बदल दिया। मैदानों में अब पानी की टंकी और सुलभ शौचालय बन गए। धीरे-धीरे मेले की जगह सिमट गई और अब दुकानें मंदिर प्रांगण के भीतर ही रह गई हैं। कभी 400 दुकानों वाला मेला अब केवल 100 दुकानों तक सिमट गया है। बड़े झूले और सर्कस अब यादों में ही बचे हैं। 103 साल पुरानी यह परंपरा अब जगह की कमी से जूझ रही है। अगर मेले के लिए वैकल्पिक और पर्याप्त जगह नहीं बनाई गई, तो आने वाले वर्षों में यह ऐतिहासिक मेला पूरी तरह समाप्त हो सकता है। अब सवाल प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से है क्या न्यायधानी की इस सांस्कृतिक धरोहर को बचाने ठोस कदम उठाए जाएंगे, या चांटीडीह का महाशिवरात्रि मेला केवल यादों में ही रह जाएगा?

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