लांबाखेड़ा के सरकारी प्राइमरी स्कूल में 1998 से पदस्थ रामविलास नागबे को 2021 में रिटायरमेंट के बाद बड़ी निराशा हाथ लगी। उनकी सेवा 1998 से मानी जानी थी, लेकिन वरिष्ठता 2018 से गिनी गई। इसका नतीजा यह हुआ कि 25,000 रुपए पेंशन की जगह उन्हें केवल 900 रुपए मिल रहे हैं। रिटायरमेंट के समय मिलने वाली ग्रेच्युटी भी नहीं मिली। शगुफ्ता परवीन, जो निशातपुरा प्राइमरी स्कूल से 2022 में सेवानिवृत्त हुईं, को भी इसी विसंगति का सामना करना पड़ा। उन्हें सिर्फ 1,800 रुपए पेंशन मिल रही है। यह समस्या अकेले भोपाल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश में 1,500 से अधिक शिक्षक रिटायर हो चुके हैं, जिन्हें इस विसंगति का नुकसान झेलना पड़ा है। कुल 2.37 लाख शिक्षक, जिनकी नियुक्ति 1998 से 2013 के बीच हुई थी, आने वाले समय में इसी स्थिति में होंगे। इस तरह समझें… वरिष्ठता का नुकसान राष्ट्रीय शिक्षा नीति प्रदेश स्तरीय क्रियान्वयन समिति के सदस्य डॉ. क्षत्रवीर सिंह राठौड़ के अनुसार ग्रेच्युटी के लिए न्यूनतम पांच साल सेवा जरूरी है। 2018 से वरिष्ठता मानी गई तो 2023 से पहले रिटायर हुए शिक्षकों की पांच साल की सेवा पूरी नहीं हुई। इससे ग्रेच्युटी नहीं मिली। 2018 में शिवराज सरकार ने अध्यापक संवर्ग को मप्र राज्य स्कूल शिक्षा सेवा में मर्ज किया था, जिससे सभी की वरिष्ठता 1 जुलाई 2018 से गिनी जाने लगी। इससे 20 साल तक की वरिष्ठता का नुकसान हुआ। कौन कितना नुकसान झेल रहा
{1998 में शिक्षाकर्मी बने: 20 साल की वरिष्ठता घटी। {2001 से 2013 तक संविदा शिक्षक: पांच से 17 साल तक नुकसान। {2007 में अध्यापक संवर्ग बना, लेकिन पद संविदा शिक्षक का ही रहा। विसंगति का दुष्प्रभाव: शासकीय शिक्षक संगठन के कार्यकारी अध्यक्ष उपेंद्र कौशल ने बताया कि पदोन्नति और क्रमोन्नत वेतन के लिए 1998 से वरिष्ठता मानी जा रही है, लेकिन पेंशन और ग्रेच्युटी में इसे 2018 से गिना गया है। यह दोहरा मापदंड है। पेंशन और ग्रेच्युटी से जुड़े मामले सभी विभागों के लिए शासन स्तर पर ही तय होते हैं। एनपीएस देश भर में लागू हुई है। विभागीय स्तर पर कहां क्या समस्या है इसकी जानकारी बुलाकर समीक्षा की जाएगी।
– डॉ संजय गोयल, सचिव, स्कूल शिक्षा


