3 साल में 268 हे. भूमि में लगी फसल खा गई नीलगाय

जंगली जानवरों ने दो ग्रामीणों को मार डाला व दो लोग घायल हुए लव कुमार दूबे | गढ़वा उत्तरी वन प्रमंडल क्षेत्र के भवनाथपुर, कांडी, मेराल व गढ़वा प्रखंड में नील गाय का आंतक से किसान काफी परेशान हैं। वहीं धुरकी प्रखंड क्षेत्र में कभी कभार हाथियों की झुंड से भी ग्रामीणों को जान-माल की क्षति हुई है। पिछले तीन वर्षों के दौरान 268 हेक्टेयर भूमि में लगी फसल को नील गायों ने नष्ट कर दिया है। इसमें कुल 829 आवेदन विभाग को प्राप्त हुआ। जिसमें फसल क्षति की 73 लाख 56 हजार 751 रुपए का भुगतान किया गया है। साथ ही धुरकी प्रखंड क्षेत्र में हाथियों ने दो ग्रामीणों को मार डाला है। वहीं नील गाय व जंगली सूअर ने दो ग्रामीणों को घायल भी किया है। प्रावधान के अनुसार ग्रामीणों को मुआवजा का भुगतान विभाग की ओर से कर दिया गया है। नील गाय पड़ोसी राज्य बिहार व छत्तीसगढ़ से झारखंड के सीमावर्ती क्षेत्र गढ़वा जिले में प्रवेश करते हैं। तीन वर्ष के आंकड़े : वर्ष 2022-23 में नील गाय ने 52.55 हेक्टेयर में लगे फसल को नष्ट कर दिया था। इसमें 94 किसानों ने विभाग को आवेदन दिया था। जिसमें दस लाख 49 हजार 800 रुपए का मुआवजा की राशि का भुगतान किया गया। वहीं एक व्यक्ति को हाथी ने घायल कर दिया था। जिसमें प्रावधान के अनुसार घायल व्यक्ति को दो लाख रुपए विभाग की ओर से मुआवजा राशि का भुगतान किया गया। इसी प्रकार वर्ष 2023-24 में 137 हेक्टेयर भूमि में लगे फसल को नील गाय ने नष्ट कर दिया था। इस दौरान 427 आवेदन विभाग को प्राप्त हुआ था। जिसमें 51 लाख 64 हजार 989 रुपए मुआवजा की राशि का भुगतान किया गया। वहीं धुरकी प्रखंड के एक व्यक्ति को हाथी ने मार डाला था और भवनाथपुर प्रखंड क्षेत्र के एक ग्रामीण को नील गाय ने घायल कर दिया था। प्रावधान के अनुसार हाथी से मौत मामले में चार लाख रुपये और नील गाय से घायल मामले में 49711 रुपये का भुगतान किया गया था। वर्ष 2024-25 में अब तक नील गाय ने 78 हेक्टेयर भूमि में लगे फसल को नष्ट कर दिया था। विभाग को मुआवजा के लिए 308 आवेदन प्राप्त हुआ था। जिसमें 11 लाख 41 हजार 962 रुपये का भुगतान कर दिया गया है। वहीं धुरकी प्रखंड क्षेत्र के एक ग्रामीण को हाथी ने मार डाला था वहीं एक ग्रामीण को जंगली सुअर ने घायल कर दिया था। जिसमें प्रावधान के अनुसार चार लाख रुपये और 25 हजार रुपये मुआवजा का भुगतान किया गया है। कम जनसंख्या से ही नील गाय पर लग सकता है अंकुश : नील गाय से फसल की बचाव के लिए इनकी जनसंख्या को कम करना ही एक मात्र उपाय है। हालांकि सरकार की ओर से इन्हें मारने की इजाजत नहीं है। बिहार राज्य में वर्ष 2016 में एक वर्ष के लिए नील गाय को मारने की स्वीकृति दी गई थी। इस दौरान नील गाय बचने के लिए काफी संख्या में झारखंड में प्रवेश कर गए। वहीं दूसरी उपाय फसल लगे खेत की घेराबंदी है। नील गाय 8-9 फीट की ऊंचाई पर छलांग लगा सकते हैं। वहीं झूंड में सर्वाधिक फिमेल नील गाय ही रहतीं हैं। नील गाय सभी प्रकार के फसल पसंद करते हैं। जंगली जानवरों से क्षति पर मुआवजा का है प्रावधान : डीएफओ : उत्तरी वन प्रमंडल पदाधिकारी अंशुमान ने कहा कि जंगली जानवरों से बचाव के लिए ग्रामीणों को जागरूक होना होगा। वहीं फसल लगे खेत की घेराबंदी और वाच टावर बनाकर फसल की निगरानी किसान कर सकते हैं। साथ ही जान-मान की क्षति होने पर सरकार की ओर से मुआवजा राशि भुगतान करने का प्रावधान है।

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