फाल्गुन मास की शुरुआत के साथ शहर में होली के गीत और फाग महोत्सव की मस्ती छा गई है, लेकिन भीतरी शहर के गंगश्यामजी मंदिर में तो जैसे फागोत्सव की असली बहार खिली हुई है। ये शहर का पहला ऐसा मंदिर है जहां होली का जश्न महज एक-दो दिन नहीं, बल्कि पूरे 45 दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है। उत्सव की शुरुआत बसंत पंचमी से होती है और रंग पंचमी तक जारी रहता है। इस रंगारंग उत्सव में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और भक्ति के रंग में रंग जाते हैं। सबसे खास बात ये है कि मंदिर में 250 सालों से होली खेलने की परम्परा निभाई जा रही है। विदेशी पर्यटक भी होते हैं शामिल यहां रोजाना श्रद्धालुओं को पुष्प और गुलाल की होली खिलाई जा रही है। फाग गीतों की धुन पर लोग नाचते-गाते एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाते हैं और प्रेम भरी होली की शुभकामनाएं बांटते हैं। श्रद्धालु भी भक्ति के इस रंग में रंगे हुए नजर आ रहे हैं। खास बात ये है कि विदेशी पर्यटक भी यहां होली के उत्सव को देखने के लिए पहुंचते हैं।। परम्परा का हो रहा निर्वहन मंदिर के पुजारी सिद्धार्थ शर्मा बताते हैं कि सुबह 12 से 2 बजे तक गुलाल और पुष्पों से होली खेली जाती है, जबकि रात 8 से 11 बजे तक होली के मधुर गीतों का गायन होता है। ये परंपरा पिछले 250 सालों से चली आ रही है और आज भी उतनी ही जीवंत है। यहां होली खेलने आई दिया ने बताया कि पूरे एक माह तक होली खेलने के लिए आएंगे। रजनी ने बताया कि वो पहली बार यहां होली खेलने आई है। बहुत अच्छा लग रहा है। एक अन्य महिला श्रद्धालु ने बताया जोधपुर में ये एक तरह का बृज है। यहां 13 वर्षों से आ रहे हैं। दहेज में मिले थे भगवान बता दें कि मंदिर में विराजमान भगवान श्याम की प्रतिमा जोधपुर नरेश राव गांगा को उनके विवाह में दहेज के रूप में मिली थी। राव गांगा (1515-1531) का विवाह सिरोही के राव जगमाल की पुत्री रानी देवड़ी से हुआ था। विदाई के समय राव जगमाल ने बेटी की भगवान कृष्ण के प्रति गहरी आस्था देखकर कृष्ण की मूर्ति और ठाकुरजी की सेवा के लिए सेवग जीवराज को भी दहेज में जोधपुर भेज दिया। पहले ये मूर्ति किले में स्थापित की गई, फिर शहर की जूनी धान मंडी में विक्रम संवत 1818 में भव्य मंदिर बनवाकर प्रतिष्ठित की गई। चूंकि राव गांगा ने इसे स्थापित किया, इसलिए इन्हें गंगश्यामजी कहा जाता है।


