राजसमंद जिले के कांकरोली स्थित पुष्टिमार्गीय श्री द्वारिकाधीश मंदिर में मंगलवार रात्रि से परंपरागत राल दर्शन की शुरुआत हो गई। राल दर्शन के दौरान द्वारिकाधीश प्रभु के सम्मुख दो विशाल मशालों पर राल उड़ाई गई, जिससे आकाश में करीब 50 फीट तक ऊंची अग्नि लपटें उठती दिखाई दीं। इस अलौकिक और दिव्य दृश्य के साक्षी बनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर में उमड़ पड़े। होली दहन तक सात बार होंगे राल दर्शन मंदिर परंपरा के अनुसार होली दहन तक कुल सात बार राल दर्शन कराए जाएंगे। राल दर्शन के दौरान मंदिर परिसर में गुलाल और अबीर उड़ने से वातावरण भक्तिरस और उल्लास से सराबोर हो गया। श्रद्धालुओं ने भजन-कीर्तन के साथ प्रभु के जयकारे लगाए। 350 साल पुरानी परंपरा, बाल लीलाओं से जुड़ा है महत्व करीब 350 वर्षों से चली आ रही इस अनूठी परंपरा के पीछे गहरी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। मंदिर सेवा से जुड़े राजकुमार गौरवा ने बताया कि राल दर्शन भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का प्रतीक है। मान्यता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण गायों को चराने जंगल जाते थे, तब उठने वाली अग्नि की लपटों को वे अपने मुख में समाहित कर लेते थे। राल दर्शन उसी दिव्य लीला का सजीव प्रतीक माना जाता है। धार्मिक के साथ वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व राल दर्शन का धार्मिक महत्व होने के साथ-साथ इसका वैज्ञानिक और सामाजिक पक्ष भी बताया जाता है। ऋतु परिवर्तन के समय संक्रमण और बीमारियों से बचाव के लिए राल उड़ाई जाती है। अग्नि की ऊष्मा वातावरण को शुद्ध करती है और नकारात्मक तत्वों के नाश की मान्यता भी इससे जुड़ी हुई है। दूर-दराज से पहुंच रहे श्रद्धालु राल महोत्सव के दर्शन के लिए गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश सहित विभिन्न राज्यों और जिलों से श्रद्धालु बड़ी संख्या में द्वारिकाधीश मंदिर पहुंच रहे हैं। श्रद्धालुओं में राल दर्शन को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है।


