निमाड़ के प्रसिद्ध संत सियाराम बाबा 11 दिसंबर को खरगोन के कसरावद तेली भट्यान में नर्मदा तट पर स्थित आश्रम में ब्रह्मलीन हो गए। निधन से उनके अनुयायियों में शोक है। सीएम डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी। आश्रम से जुड़े सेवादारों का कहना है कि बाबा को अपने अंतिम समय का आभास पहले ही हो गया था। उन्होंने इसके संकेत भी दिए थे। अपने कमरे में गादी के पास ईंट की दीवार भी बनवा ली थी। बाबा सिर्फ कर्म में विश्वास करते थे। भक्तों को आशीर्वाद के रूप में अच्छे कर्म करने के लिए कहते थे। उन्होंने अयोध्या में श्रीराम भगवान के दर्शन की इच्छा जताई थी, जो अधूरी रह गई। दैनिक भास्कर ने बाबा से जुड़े सेवादारों से बात की। उनके अनुभव और बाबा से जुड़े किस्से भी बताए। संत सियाराम बाबा के अंतिम संस्कार की 5 तस्वीरें देखिए 28 नवंबर से स्वास्थ्य खराब होने लगा
तेली भट्यान के रहने वाले मोतीराम बिरला (35) पिछले 22 साल से बाबा से जुड़े हैं। अंतिम दिनों में भी वे बाबा के साथ थे। मोतीराम बताते हैं कि 28 नवंबर से बाबा का स्वास्थ्य खराब होने लगा था। कुछ दिन सनावद के मोरी अस्पताल में इलाज चला। जब वापस आश्रम लाया गया, तो बाबा ने सेवादारों से कहा था, ‘अब मेरा शरीर साथ नहीं दे रहा, कमजोर हो गया है, कोई भरोसा नहीं है।’ तीन मंजिल आश्रम में बाबा का गादी स्थान नीचे है। बाबा ने सेवादारों से कहकर इस कक्ष में ईंटों की चार फीट ऊंची दीवार बनवा दी थी। उन्होंने कहा था कि इस तरफ का हिस्सा मेरा और दूसरा हिस्सा आने वाले भक्तों के लिए होगा। बाबा ने बताया था- 17 साल की उम्र में छोड़ा था घर
मोतीराम बिरला बताते हैं कि वह आश्रम में सुबह–शाम जाते थे। बाबा के पास घंटों बैठे रहते थे। वहां सेवा भी करते थे। वैसे तो बाबा कम बोलते थे, लेकिन बाबा अपने जीवन के बारे में बताते रहते थे। वे धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर भी चर्चा करते थे। मोतीराम के मुताबिक, ‘बाबा ने खुद के बारे में बताया था कि उनका जन्म गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में हुआ था। पिता की मुंबई में नौकरी होने पर वहीं रहे। 11वीं तक पढ़ाई की। ट्रेन से स्कूल आते-जाते थे। जब वह बहुत छोटे थे, तब मां का निधन हो गया। जब 17 साल उम्र थी, तब पिता गुजर गए थे। इसके बाद घर छोड़ दिया था। बाबा ने बताया था कि घर छोड़ने के बाद किसी संत के सानिध्य में रहे। तीन साल तक अपने गुरु के साथ देशभर में भ्रमण किया। दो साल तक अकेले भ्रमण किया। 1955 में जब वह 22 साल के थे, तब तेली भट्यान आ गए थे। इसके बाद से यहीं रहे। हालांकि उन्होंने अपने गुरु के नाम का जिक्र कभी नहीं किया, लेकिन वह सरस्वती मां को अधिक मानते थे। कुछ समय पहले गादी वाले स्थान के पास ही सरस्वती मां की प्रतिमा स्टील से बने मंदिर में विराजित की थी।’ शुरुआत में खाई पत्तियां, फिर 5 घरों से मांगने लगे भोजन
बिरला कहते हैं, ‘बाबा कई बार पुरानी बातें भी बताते थे। उनके अनुसार पहले नर्मदा किनारे कोई आता-जाता नहीं था। भोजन नहीं मिलता था, तो पत्तियां खाकर कुछ दिन निकाले। इसके बाद वे गांव में ही केवल 5 घरों से खाना मांगकर खाने लगे। इस दौरान उन्होंने नर्मदा किनारे खुले में ही बारिश, गर्मी, ठंड में खड़े रहकर साधना शुरू की। यह देख कुछ लोगों ने चद्दर का शेड लगवाया। यहीं उन्होंने त्रिवेणी लगाकर हनुमान जी की प्रतिमा विराजित कर उपासना शुरू करी दी। धीरे-धीरे भक्तों की संख्या बढ़ती गई। उन्होंने अपने तप और त्याग से लोगों के हृदय में जगह बनाई। उनके मुंह से पहली बार सियाराम का उच्चारण हुआ था, तभी से लोग उन्हें संत सियाराम बाबा कहकर पुकारते हैं।’ खुद बनाते थे चाय प्रसादी, भोजन में मीठा पसंद था बिरला ने बताया कि बाबा सुबह नित्य कर्म के बाद ऊपर के कमरे से नीचे भक्तों के बीच आते थे, तो दूध उबल कर तैयार मिलता था। वे खुद चाय पत्ती व मसाला डालते थे। यही चाय सभी भक्तों को बांटी जाती थी। कुछ साल पहले तक बाबा के लिए गांव वाले भोजन भेजते थे। वे पूरा भोजन मिलाकर आश्रम से नीचे घाट किनारे बैठते थे। पहले कौवों, बगुलों और कुत्तों को भोजन डालते थे। फिर खुद खाते थे। उन्हें भोजन में मीठा अधिक पसंद था। सीजन के समय रोजाना आम भी खाते थे, लेकिन जब शरीर कमजोर होने लगा, तो मीठा खाना कम कर दिया था। कमरे में दो टीवी, दिनभर न्यूज, रामायण चलती बिरला बताते हैं कि बाबा को अपना काम खुद करना पसंद करते थे। जो काम हाथ में लेते थे, उसे पूरा करके ही मानते थे। जब मन होता रामायण पाठ के लिए बैठ जाते। फुर्सत में टीवी पर न्यूज और रामायण देखते थे। उनके कमरे में दो टीवी लगी हैं, जिसमें एक पर न्यूज, तो दूसरे पर रामायण या अन्य धार्मिक कार्यक्रम चलते रहते थे। बाबा ने बोला था- मोदीजी के काम बाद में दिखेंगे बिरला का कहना है कि यूं तो बाबा आश्रम पर आने वाले साधु-संतों, परिक्रमावासियों की आवाभगत करते थे, लेकिन नेता, अधिकारियों से ज्यादा बातचीत नहीं करते थे। बावजूद एक बार टीवी पर न्यूज देखते समय हमने उनसे पूछा कि मोदीजी हमेशा विदेश घूमते रहते हैं। ये कुछ करेंगे कि नहीं, तो बाबा ने तपाक से बोला था कि ये जो करेंगे, इसका प्रभाव अभी नहीं, आने वाले सालों में दिखेगा। अयोध्या जाने की इच्छा रह गई अधूरी बिरला के मुताबिक जब अयोध्या में भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा हुई, तब से भी बाबा की वहां जाने की इच्छा थी। वे बार-बार वहां जाने की इच्छा जताते थे, लेकिन शारीरिक रूप से कमजोर होने के कारण नहीं जा पाए। उनके पैरों में इन्फेक्शन भी था। इस कारण चलने-फिरने में दिक्कत होती थी। वो कहते थे कि पैर साथ दें, तो इस वृद्धावस्था में भी पहाड़ चढ़ जाऊं। 4 लाख के काजू-किशमिश हाथों से बांटे बड़वाह के रहने वाले पंडित संजय शर्मा ने बताया कि अस्वस्थ होने से एक दिन पहले बाबा ने नर्मदा घाट पर स्थापित शिवलिंग स्थान पर गणेश, पार्वती माता व नंदी की प्राण प्रतिष्ठा करवाई थी। पं. शर्मा ने बताया कि प्रतिष्ठा वाले दिन बाबा ने करीब चार लाख रुपए के काजू–किशमिश व 50 हजार के मूंगफली के दाने बुलवाए थे। इसे दिन भर में भक्तों को बांट दिया था। इसी के दूसरे दिन से उनकी तबीयत खराब हो गई थी। बाबा कहते थे- चमत्कार नहीं, कर्म में रखो विश्वास बाबा के सेवादार तेली भट्टान गांव के ही डॉ. हरी बिरला ने बताया, ‘बाबा को भले ही लेाग चमत्कारी मानते थे, लेकिन वे चमत्कार नहीं, बल्कि कर्म में विश्वास रखते थे। वे अपना काम खुद करते थे। सभी को इसके लिए प्रेरित करते थे। जब कोई उनसे आशीर्वाद मांगता था, तो कहते थे कि “आशीर्वाद अपना कर्म देता है। जैसे कर्म करोगे, वैसा ईश्वर आशीर्वाद देता है।” केवल 10 रुपए लिए, लेकिन करोड़ों दान किए बाबा अपने भक्तों से दान स्वरूप केवल 10 रुपए ही लेते थे। दानदाता का नाम भी खुद लिखते थे, लेकिन जब सुनाई कम देने लगा, तो ग्रामीणों ने दानदाताओं का नाम लिखना शुरू किया। पिछले चार साल में भक्तों की संख्या इतनी बढ़ी कि लिखना भी बंद कर दिया। आश्रम के डूब क्षेत्र में आने पर मुआवजे में मिले करीब ढाई करोड़ रुपए नागलवाड़ी शिखरधाम मंदिर, जामघाट स्थित पार्वती देवी मंदिर में 40 लाख, अयोध्या राम मंदिर निर्माण में 2.50 लाख दान में दिए। दान में मिले 40 लाख से नर्मदा घाट का निर्माण करवाया। हनुमान जी के भक्त थे संत सियाराम संत सियाराम बाबा हनुमान जी के भक्त थे। वे रामचरित मानस का पाठ करते रहते थे। भीषण गर्मी हो, सर्दी हो या भारी बारिश, बाबा सिर्फ लंगोटी पहनकर रहते थे। अनुयायियों का कहना है कि उन्होंने साधना के माध्यम से अपने शरीर को मौसम के अनुकूल बना लिया था। यह भी पढ़ें- निमाड़ के संत सियाराम बाबा पंचतत्व में विलीन निमाड़ के प्रसिद्ध संत सियाराम बाबा पंचतत्व में विलीन हो गए। खरगोन के कसरावद के तेली भट्यान गांव में नर्मदा किनारे उनका अंतिम संस्कार किया गया। साधु-संतों ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस दौरान लाखों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने नम आंखों से उन्हें विदाई दी। सीएम डॉ. मोहन यादव भी अंतिम संस्कार में शामिल हुए। पढ़ें पूरी खबर


