जीवन में व्यक्ति को धोखा कौन देता है। अपने सगे, संबंधी, पराए या और कोई? भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं जीवन में हमें कोई धोखा नहीं देता, हम स्वयं, स्वयं को धोखा देते हैं। व्यक्ति धोखेबाज मन के चक्कर में पड़ा रहता है। मन की बात नहीं मानना चाहिए, मन से अपनी बात मनवाना चाहिए। यह तभी संभव है, जब आपका अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण हो, परमात्मा में विश्वास हो, सनातनी नियमों, धर्मों को मानते हों। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में शुक्रवार को यह बात कही। लौकिक सुख मिथ्या, परलौकिक सुख सत्य महाराजश्री ने एक दृष्टांत सुनाया- एक युवक ने एक साधु से कहा कि हमें कौन धोखा देते है, तब साधु ने कहा कि तुम कल प्रात: काल तालाब पर हमारे पास आना। युवक साधु के बताए अनुसार दूसरे दिन तालाब पर पहुंच गया। साधु पहले से ही वहां पानी से भरा एक बर्तन लिए बैठे थे। उन्होंने बर्तन में मिश्री डाल दी, युवक से कहा लो इसे घोलो, युवक ने घोल दी, महात्मा ने कहा- अब इसे चखो, युवक ने चखा और कहा- यह तो बहुत मीठा है। फिर साधु ने कहा इस बर्तन को उलटा दो, अब तालाब का पानी बर्तन में भरो। अब इसे चखो, युवक बोला- यह तो कड़वा है। साधु बोला- इसी तरह यह मन है, जो व्यक्ति को धोखा देता है। जो हमारे लिए आवश्यक नहीं है, वह उस ओर भागता है और जो आवश्यक है उससे हमें दूर रखता है। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं- व्यक्ति लौकिक सुखों में इतना डूब जाता है, कि वह परलोक को नहीं समझता है, जबकि लौकिक सुख मिथ्या है, परलौकिक सुख सत्य है। सपने पूरे करने के लिए भी कर्म जरूरी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने कहा कि व्यक्ति लक्ष्य तो चाहता है परंतु उसे प्राप्त करने का प्रयास नहीं करता। सपने देखता है, पर सपने पूरे करने के लिए कर्म नहीं करता। वह केवल सांसारिक सुखों को देखता है। स्वयं को नहीं देखता है। यदि वह अपने स्वरूप को जान जाए तो माया मोह में नहीं फंसे। यह माया ही है जो असत्य में सत्य का दर्शन कराती है। जिसके कारण व्यक्ति अपने स्वरूप को नहीं समझ पाता और वह स्वयं के द्वारा स्वयं को ही धोखा देता है।


