छत्तीसगढ़ में 10 लाख की जमीन 70 लाख की:5-9 गुना बढ़ी कीमत, व्यापारियों ने गाइडलाइंस को इलॉजिकल बताया,जानिए आप पर क्या असर होगा

छत्तीसगढ़ में नई कलेक्टर गाइडलाइंस की वजह से जमीन की कीमतें 5-9 गुना बढ़ गई हैं। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग-भिलाई और अंबिकापुर समेत कई जिलों में रियल एस्टेट कारोबारियों ने कीमतों का विरोध किया है। जिस जमीन की कीमत पहले 10 लाख रुपए थी, वह अब 70 लाख रुपए हो गई है। रियल एस्टेट कारोबारियों ने गाइडलाइंस में बदलाव को बेतुका बताया है। उन्होंने सरकार से गाइडलाइंस में बदलाव करने की मांग की है। उन्होंने यह भी कहा है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे रजिस्ट्री का बायकॉट करेंगे। वहीं किसानों ने भी चिंता जताई है कि जमीन की ज्यादा कीमतों की वजह से उन्हें अपनी जमीन बेचने के लिए खरीदार नहीं मिलेंगे। इससे उन पर पैसे का बोझ बढ़ेगा, जबकि पंजीयन विभाग का कहना है कि लंबे समय से जमीन की सरकारी कीमत नहीं बढ़ने की वजह से बाजार भाव और सरकारी कीमत में बड़ा अंतर हो गया था। भास्कर एक्सप्लेनर में 6 पॉइंट्स में समझिए…सरकार के गणित ने रातों-रात जमीन के दाम कैसे बढ़ा दिए, व्यापारी नई गाइडलाइंस का विरोध क्यों कर रहे हैं, उनकी क्या मांगें हैं और इसका आपकी जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा? प्वाइंट 1. पिछली सरकार ने 30% छूट दी थी, वो अब खत्म पहले सरकार जमीन का मूल्य (बाजार मूल्य) निकालते समय 30% कम कर देती थी। उदाहरण के तौर पर अगर किसी जमीन का बाजार मूल्य 10 लाख है, तो रजिस्ट्री के समय इसे 30% कम कर दिया जाता था। यानी 10 लाख का सिर्फ 70% (7 लाख) माना जाता था। इसी कम किए गए मूल्य पर जमीन पर 4% और 75 लाख तक के मकानों पर 2% पंजीयन शुल्क लिया जाता था। अब सरकार ने 30% की छूट खत्म कर दी है। जमीन/मकान का पूरा 100% मूल्य ही गिना जाएगा, लेकिन पंजीयन ड्यूटी (4% और 2%) अभी भी वही रखी है, कम नहीं की गई। व्यापारियों की मांग और समस्या समझिए जब मूल्य कम किया जाता था (70%), तब 4% पंजीयन शुल्क लेना ठीक था, लेकिन अब मूल्य सीधा 100% गिना जा रहा है, तो लोगों का कहना है कि जब जमीन की कीमत बढ़ाकर 100% कर दी गई है। ऐसे में पंजीयन शुल्क में भी 3.2% कम किया जाए। इसे फिर से 0.8% किया जाए, ताकि भार बराबर रहे। रजिस्ट्रेशन ड्यूटी घटाने की मांग छत्तीसगढ़ में पहले रजिस्ट्रेशन ड्यूटी 30% कम होता था, इसलिए 4% में लेना ठीक था। अब मूल्य 100% हो गया तो शुल्क भी 4% से घटाकर 0.8% किया जाए, ताकि आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। इन शॉर्ट पुराने नियम में जमीन सस्ती मानी जाती थी, इसलिए स्टांप ड्यूटी ज्यादा रखी गई थी। अब जमीन पूरी कीमत पर मानी जा रही है, लेकिन शुल्क अभी भी पहले जितना ही है, इसलिए इसे कम करने की मांग कर रहे हैं। प्वाइंट 2. एक ही जमीन की दाे अलग–अलग दर, इससे कीमत 9 गुना तक बढ़ी रियल स्टेट बिजनेसमैन गुरबख्श छाबड़ा ने बताया कि पहले नगरीय क्षेत्र (नगर निगम/नगर पालिका/नगर पंचायत) में जमीन की कीमत एक ही तरीके से निकाली जाती थी। लेकिन अब एक ही जमीन को दो हिस्सों में बांटकर दो अलग-अलग दरों से मूल्यांकन किया जा रहा है। इससे जमीन का कुल मूल्य बहुत ज्यादा बढ़ गया, लगभग 7 गुना से 9 गुना तक। यानी जो जमीन 10 लाख थी, उसकी कीमत 70 लाख तक हो चुकी है। जहां रजिस्ट्रेशन शुल्क 70 हजार लगता वो 7 लाख लगेगा। समझिए क्या हुआ है… मान लीजिए आपके पास एक बड़ा प्लॉट है, पहले सरकार पूरा प्लॉट एक ही रेट से कीमत तय करती थी। जैसे पूरा प्लॉट का 100 रुपए रेट है। तो पूरे प्लॉट का रेट 100 × प्लॉट का आकार के हिसाब से तय होता था। यानी पूरा प्लाट 100 के हिसाब से बिक रहा होता था। अब सरकार कहती है इस कि वो इस बड़े प्लाट को दो हिस्से बाटेंगे। एक हिस्सा सड़क के पास और दूसरा हिस्सा भीतरी और दोनों का अलग-अलग रेट लगेगा। इससे हुआ यह है कि सड़क वाला हिस्सा बहुत महंगे रेट पर बिकेगा। इससे उसकी कुल कीमत बहुत बढ़ जाती है। कुछ इस तरह बढ़ गया है रेट इसको और सरल तरीके से समझना है तो एज्यूम कीजिए कि एक चाकलेट का एक बॉक्स है जिसमें 100 चॉकलेट हैं। पहले दुकानदार बोलता था, एक चॉकलेट 1 रुपए में आएगी। इस लिहाज से 100 चॉकलेट का मूल्य 100 रुपए हुआ। अब दुकानदार कहता है कि बॉक्स के ऊपर की 20 चॉकलेट “प्रीमियम” हैं। इनका रेट 10 रुपए प्रति चॉकलेट होगा। वहीं बाकी बचे 80 चॉकलेट का रेट सामान्य हैं, यानी 1 रुपए प्रति चॉकलेट तो अब नई कीमत बनेगी, 20 टॉफी × 10 रुपए = 200 रुपए। और 80 टॉफी × 1 रुपए = 80 रुपए तो कुल हुए 280 रुपए। इस तरह जो चॉकलेट का बॉक्स पहले 100 रूपए का था, वो अब 280 का है। यानी 180% ज्यादा। एक बार में 7 से 9 गुना बढ़ गई कीमत नई गाइडलाइन के आने के बाद पहले जो जमीन 1.77 करोड़ में मिल रही थी। वो अब 12.79 करोड़ में मिलेगी। इस तरह एक ही बार में 7 गुना (725%) बढ़ोतरी हो गई है। प्वाइंट 3. मल्टीस्टोरी बिल्डिंग के लिए जमीन से तीन गुना ज्यादा रजिस्ट्री शुल्क 2004 के पहले किसी भी बहुमंजिला भवन में रजिस्ट्री सिर्फ जमीन के अनुपात के आधार पर होती थी। यानी जितना हिस्सा आपके फ्लैट का जमीन पर आता है, उतना ही जमीन मूल्य माना जाता था। इससे रजिस्ट्री उचित रकम में हो जाती थी। अब बहुमंजिला भवन में फ्लैट/दुकान बेचते समय सरकार सुपर बिल्ट–अप एरिया पर मूल्यांकन करती है। मतलब आपकी दीवारों का एरिया उदाहरण से समझिए… मान लीजिए आपके बिल्डर के पास 10,000 वर्गफीट जमीन है तो उसका FAR यानी फ्लोर एरिया रेशियो 2.5 दिया है, यानी जमीन पर कुल 2.5 गुना निर्माण की अनुमति है। इसलिए बिल्डर 10,000 × 2.5 = 25,000 वर्गफीट भवन बना सकता है। सुपर बिल्ट–अप में बिल्डर इस 25,000 वर्गफीट को बढ़ाकर लगभग 30,000 वर्गफीट घोषित कर देता है। ( कॉमन एरिया जोड़ देता है) प्वाइंट 4: नवा रायपुर की जमीन अब शहरी जमीन में आएगी, इससे कीमतें बढ़ी सरकार ने नवा रायपुर के आसपास के सभी गांवों को ‘नगरीय क्षेत्र’ (Urban Area) घोषित कर दिया है। यानी अब इन गांवों की जमीन को गांव वाली जमीन नहीं, बल्कि शहर वाली जमीन के तौर पर कंसीडर्ड किया जाएगा। इसका इम्पैक्ट समझिए जब किसी जमीन को नगरीय क्षेत्र में माना जाता है तो उसका मूल्यांकन (rate) बढ़ जाता है। जमीन दो हिस्सों में बांटकर अलग-अलग दरों से मूल्य निकाला जाता है। इस तरह किसानों/ग्रामवासियों की जमीन का रेट अचानक 5 से 9 गुना तक बढ़ जाएगा। इससे रजिस्ट्री और स्टांप शुल्क भी बहुत ज्यादा बढ़ गया। व्यापारी बोले – गांव को शहर बताकर रेट बढ़ाया गया व्यापारियों का कहना है कि किसी भी इलाके को नगरीय क्षेत्र घोषित करने के लिए सरकार के साफ नियम और मापदंड होते हैं, जैसे— प्वाइंट 5: गांव की हर सड़क मेन रोड मानी जाएगी नई गाइड लाइन में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य मार्ग, मुख्य जिला मार्ग, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क, मुख्यमंत्री ग्राम सड़क और PWD की बनी सड़क सभी “मुख्य मार्ग” मानी जाएंगी। यानी अब गांव में बनी ज्यादातर पक्की सड़कें “मुख्य सड़क” के रूप में गिनी जा रही हैं। जमीन का रेट (गाइडलाइन वैल्यू) अक्सर “मुख्य सड़क” के पास होने के हिसाब से बहुत ज्यादा माना जाता है। बाहर और भीतर दोनों जमीन की कीमत बढ़ेगी गणित समझिए, गांव में सिर्फ 1–2 मुख्य सड़कें होती थीं। उन्हीं के पास जमीन का रेट ज्यादा होता था। मान लीजिए कि इनका रेट 10 लाख/एकड़ और अंदर की जमीन का रेट 3 लाख/एकड़ था। लेकिन नया नियम कहता है चाहे गांव के बीच की छोटी सड़क ही क्यों न हो उसे भी “मुख्य मार्ग” माना जा रहा है। इससे गांव की लगभग हर सड़क “मुख्य सड़क” बन जाएगी। और हर जमीन का रेट मुख्य सड़क रेट जैसा बढ़ जाएगा। व्यापारी बोले- सड़क बनने से गांव की रोड को NH नहीं माना जा सकता व्यापारियों और किसानों का कहना है कि यही समस्या है, प्रधानमंत्री–मुख्यमंत्री योजनाओं में हर गांव में सड़कें बन रहीं, कच्चे रास्तों का भी डामरीकरण हो रहा, बिजली–पानी–स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंच रही हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हर गांव की हर सड़क को राष्ट्रीय राजमार्ग जैसा मान लिया जाए, और हर जमीन का रेट शहर के हाईवे जैसा बढ़ा दिया जाए। प्वाइंट 6: भारत माला परियोजना के आसपास की जमीनों का रेट भी बढ़ेगा भारत माला परियोजना के आसपास की जमीनों के रेट (गाइडलाइन वैल्यू) सरकार ने बढ़ा दिए हैं। कुछ जगहों पर 300%–500% तक। व्यापारियों का कहना है कि यह बढ़ोतरी वास्तविक स्थिति के हिसाब से नहीं है और जमीन मालिकों के लिए अनुचित है। इसे पांच पार्ट में समझिए पार्ट 1. रेट का निर्धारण गलत तरीके से किया व्यापारियों का कहना है कि सरकार ने जमीन की कीमत तय करने के लिए, कोई वैज्ञानिक स्टडी नहीं की, कोई जमीन का वास्तविक सर्वे नहीं किया, न जमीन का उपयोग देखा, न आसपास की स्थिति देखी। बल्कि उप-पंजीयक (सब-रजिस्ट्रार) से यह पूछ लिया कि यहां की जमीन कितनी होनी चाहिए। फिर उसी आंकड़े को सही मानकर रेट बढ़ा दिए। मतलब किसी एक अफसर की राय पर रेट तय कर दिया गया है। इस तरीके को व्यापारियों ने गलत और अव्यवहारिक बताया है। पार्ट 2. भारत माला रोड के पास जमीन को शहर की मुख्य रोड जैसा माना गया सरकार ने ग्राम कुरूं में 11000 रुपए प्रति वर्गमीटर और 2.52 करोड़ प्रति हैक्टेयर का रेट लगा दिया — सिर्फ इसलिए कि वहां भारत माला रोड लगी है। व्यापारियों का कहना है कि भारत माला एक्सप्रेस-वे की गांव में कोई सीधी एंट्री ही नहीं है, न चढ़ने का रास्ता, न उतरने का रास्ता गांव इसका उपयोग भी नहीं कर सकता। जब गांव इस रोड का उपयोग ही नहीं कर सकता, तो फिर उसकी जमीन को “एक्सप्रेस-वे के पास” बताकर महंगी कीमत क्यों लगाई जाए? इसे अनुचित बताया है। पार्ट 3 मुआवजा डिस्ट्रीब्यूशन को लेकर भी सवाल खड़े हुए जब भारत माला बन रही थी, तब सरकार ने रोड से थोड़े अंदर वाली जमीन की दर पर मुआवजा दिया था। अब गाइडलाइन में उन्हीं जमीनों को रोड से सटी जमीन मानकर बहुत महंगा रेट लगा दिया गया। यानी मुआवजा कम दिया और गाइडलाइन रेट अचानक बहुत ज्यादा कर दिया इसे व्यापारियों ने अतार्किक बताया है। पार्ट 4. रेट बढ़ाने के हिसाब को भी गलत बताया पिछले 7 साल में गाइडलाइन रेट नहीं बढ़े थे। अगर आम आर्थिक नियम देखें, तो बैंक ब्याज 6–8% के हिसाब सेरेट 190%–200% तक बढ़ना उचित होता। पार्ट 5. स्लैब बदलने से कीमत 5–9 गुना बढ़ गई पहले 506 वर्गमीटर तक जमीन का एक स्लैब था। इससे ज्यादा होने पर जमीन की गणना हैक्टेयर से होती थी (जो किफायती होती थी) अब स्लैब बढ़ाकर 1400 वर्गमीटर कर दिया गया। इसके इम्पैक्ट को इस तरह से समझिए, 0.4050 हैक्टेयर जमीन है – जिसकी पहले सीधे हैक्टेयर की दर से गणना (कम कीमत) होती थी। लेकिन अब पहले 1400 वर्गमीटर × महंगी दर, फिर बाकी जमीन × हैक्टेयर दर। इस तरह कैलकुलेशन होगा। यानी दोनों को जोड़कर कीमत 500%–900% तक बढ़ गई। इस पूरे मामले का दूसरा पक्ष भी जानिए… अंकित आनंद, सचिव आवास एवं पर्यावरण मंत्रालय बताते हैं कि नई गाइड आने के बाद से मनी लॉन्ड्रिंग नहीं होगी, बैंकों से ज्यादा लोन मिलेगा, किसानों का मुआवजा बढ़ेगा छत्तीसगढ़ में रियल स्टेट में उछाल आने के बावजूद 8 साल से गाइडलाइन की कीमत नहीं बढ़ाई गई थी। कीमत नहीं बढ़ने से किसानों को मुआवजे में भारी घाटा, भू-अर्जन के लिए सरकार को बड़ी मशक्कत करनी पड़ रही थी। मार्केट प्राइस और गाइडलाइन कीमत में बड़ा अंतर होने की वजह से मनी लॉन्ड्रिंग को बढ़ावा मिल रहा था।मिडिल क्लास परिवारों को मकान, प्लॉट खरीदने के लिए लोन लेने में दिक्कत होती थी क्योंकि गाइडलाइन के आधार पर बैंक लोन कम देते थे। नियमों में हर साल गाइडलाइन रिवीजन करने के साथ ही तथा बाजार में आकस्मिक तेजी पर भी विशेष रिवीजन करने का प्रावधान है।लेकिन छत्तीसगढ़ में कोई रिवीजन नही हो रहा था। गाइडलाइन कीमत नहीं बढ़ने से इनकम टैक्स भी कम मिल रहा था। अभी तक प्रचलित कलेक्टर गाइडलाइन में 9463 कंडिकाएं थी, जो अब घटकर 5763 हो गई हैं। यानी लोगों के राहत के लिए बेकार के नियमों को खत्म कर दिया गया है। सरकार बोली- आम लोगों को राहत मिलेगी वाणिज्यिक कर (पंजीयन) मंत्री ओपी चौधरी के निर्देश पर बनी गाइडलाइन पर सरकार का कहना है कि ये पूरी प्रक्रिया को वैज्ञानिक, पारदर्शी और लोगों के लिए आसान बनाया गया है। नगरीय क्षेत्रों की गाइडलाइन दरें रोड-वाइज बनाई गई हैं। इससे एक ही सड़क और समान परिस्थिति वाले क्षेत्रों की कीमतें एक जैसी रहें। इसके साथ ही बहुत अधिक दस्तावेजों को हटाकर उनकी संख्या कम कर दी गई है, ताकि लोगों के लिए दरें समझना आसान हो जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में भी सभी गांवों की दरों को नक्शे में चिह्नित किया गया है। कोशिश की गई है कि एक जैसी सड़क,भू-स्थिति और परिस्थितियों वाले गांवों की कीमतें भी समान रखी जाएं। मौजूदा दरों की वैज्ञानिक तरीके से मैपिंग करके एक संतुलित बेस रेट तैयार किया गया है और उसी के आधार पर नई गाइडलाइन दरें प्रस्तावित की गई हैं।

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