कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह गुरुवार को हाईकोर्ट में दायर अपनी जनहित याचिका पर बहस के लिए पहुंचे। डिविजन बेंच में हुई अंतिम सुनवाई के दौरान दिग्विजय ने कहा कि वे 45 साल से राजनीति में हैं और लोकप्रियता पाने के लिए जनहित याचिका नहीं लगाई है। दिग्विजय ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मॉब लिंचिंग पर सख्त गाइडलाइन जारी कर स्पष्ट कहा है कि ऐसी घटनाएं किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं होंगी। इसके बावजूद प्रदेश में शीर्ष अदालत के आदेशों का पालन नहीं हो रहा है। देपालपुर, रतलाम सहित कई शहरों में घटनाएं सामने आईं, लेकिन अफसरों पर कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने कहा कि स्थिति गंभीर है, इसलिए प्रशासनिक जवाबदेही तय होना जरूरी है। दिग्विजय सिंह को जनहित याचिका दायर करने का अधिकार ही नहीं इधर, शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दलील दी कि दिग्विजय सिंह के खिलाफ हाल ही में 12 एफआईआर दर्ज हुई हैं, इसलिए उन्हें ऐसी जनहित याचिका दायर करने का अधिकार नहीं है। देपालपुर मामले में जांच बैठाने और अधिकारी नियुक्त करने का दावा भी किया गया। इस पर सिंह ने सुप्रीम कोर्ट की एसओपी का हवाला देते हुए कहा कि मॉब लिंचिंग मामलों की जिम्मेदारी एसपी स्तर के अफसर पर तय होनी चाहिए, एक थाना नामित हो और सीसीटीवी फुटेज से तुरंत गिरफ्तारी हो। शासन ने कहा कि दिग्विजय सिंह बिना तथ्यों की जानकारी के बहस कर रहे हैं। हाई कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनकर फैसला सुरक्षित रख लिया।


