झुंझुनूं जिले में इस बार मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (एसआईआर) कार्यक्रम के दौरान एक ऐसा अनूठा उदाहरण सामने आया है, जिसने पूरे प्रशासन और चुनाव विभाग का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। जिले के एक दर्जन से अधिक बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) ने एक महीने का काम महज 17 दिन में ही पूरा कर दिया। न सिर्फ फॉर्म भरे गए, बल्कि सभी गणना प्रपत्रों को ऑनलाइन कर 100 प्रतिशत लक्ष्य हासिल कर लिया गया। यह उपलब्धि ऐसे समय में हासिल हुई है, जब खेतों में रबी बुवाई का काम चल रहा है और गांवों में शादी समारोहों की धूम है। ऐसे हालात में मतदाताओं के घर घर जाना, फोटो जुटाना, पुराने रिकॉर्ड खंगालना और हर व्यक्ति की डिटेल मिलान करना किसी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन इन बीएलओ ने तकनीक और टीमवर्क को हथियार बनाकर न सिर्फ लक्ष्य पूरा किया, बल्कि एक मिसाल भी पेश की है। वाट्सऐप ग्रुप बना किया प्रेरित जिले के कई बीएलओ ने अपने बूथ के युवा मतदाताओं का वाट्सऐप ग्रुप बनाया। इसमें हर रोज एसआईआर से जुड़ी जानकारी, शंकाओं के जवाब और जरूरी दस्तावेजों की सूची साझा की जाती रही। जिनके पास फोटो नहीं थे, उन्हें मोबाइल से फोटो लेकर उसी समय फार्म भर दिया गया। कई ग्रामीणों को एसआईआर 2002 की मतदाता सूची से अपना नाम ढूंढकर दिखाया गया। बुजुर्गों व महिलाओं के ई-पिक के लिए उनके माता-पिता की डिटेल रात को सर्च की गई। अलसुबह होने वाले ऑनलाइन अपलोड का काम भी इन बीएलओ ने बिना किसी देरी के पूरा किया। इन नवाचारों और लगातार मेहनत के कारण 17 दिन में ही वह लक्ष्य पूरा हो गया, जिसे विभाग ने 30 दिनों के लिए निर्धारित किया था। चार बीएलओ—चार कहानियां, एक सफलता 1. अमित कड़वासरा, बीएलओ—श्यामपुरा-चारणवास पातुसरी निवासी और शिक्षक अमित कड़वासरा ने तकनीक का सबसे बेहतरीन उपयोग किया। उन्होंने अपने बूथ के सभी मतदाताओं का वाट्सऐप ग्रुप बनाया और पूरे एसआईआर अभियान की जानकारी उसी पर साझा करते रहे। जिनके पास पुराने दस्तावेज नहीं थे, उन्हें तुरंत समाधान भेजा। 2002 की मतदाता सूची भी ग्रुप में डाल दी, ताकि हर व्यक्ति अपने परिवार का नाम खुद खोज सके। जिनके पास फोटो भेजने का समय नहीं था, उनकी फोटो मोबाइल से लेकर फॉर्म तैयार कर दिया। उनकी इस सक्रियता ने वोटर्स की भागीदारी बढ़ाई और पूरे बूथ का काम निर्धारित समय से पहले ही पूरा हो गया। 2. सुनील कुमार चाहर, बीएलओ—समसपुर कनिष्ठ सहायक सुनील चाहर जब गांव में पहुंचे तो लोगों का अधिकांश समय खेतों में बीत रहा था। फोटो और दस्तावेज इकट्ठा करने में समस्या आ रही थी। उन्होंने रणनीति बदली—फोटो ना होने पर मौके पर ही मोबाइल से क्लिक कर दी। ज्यादा समय न लगे, इसलिए 85% लोगों की उनके माता-पिता से मैपिंग पहले ही कर दी थी। इससे रात को ऑनलाइन विवरण भरना बेहद आसान हो गया। 3. बसंतलाल, बीएलओ—पातूसरी बीबासर निवासी अध्यापक बसंतलाल ने एसआईआर शुरू होने से पहले ही तैयारी कर ली थी। उन्होंने लोगों से फोटो, आधार नंबर और मोबाइल नंबर पहले ही एकत्रित करना शुरू कर दिया। 2002 की मतदाता सूची डाउनलोड कर ग्रुप में डाल दी, ताकि लोगों को स्वयं अपने पुराने नाम खोजने में आसानी हो। जो भी मतदाता अपने ससुराल या मायके की वोटर लिस्ट मांगता, उसे उसी दिन उपलब्ध करा दी। इससे न सिर्फ समय बचा, बल्कि मतदाताओं का भरोसा भी बढ़ा। 4. सुरेंद्र सिंह काजला, बीएलओ—चिड़ासन (बूथ 151) लोयल निवासी शिक्षक सुरेंद्र सिंह ने मेहनत की एक अलग मिसाल पेश की। वे रोजाना 15 से 16 घंटे काम करते। शाम तक फॉर्म एकत्रित करते और रात को ई-पिक नंबर से माता-पिता की डिटेल ढूंढते। यह काम बेहद मेहनत वाला था, क्योंकि कई बार एक-एक व्यक्ति का विवरण ढूंढने में घंटों लग जाते थे। इसके बावजूद उन्होंने अपने बूथ के सभी फॉर्म समय से पहले ऑनलाइन कर दिए। ग्रामीण इलाकों में चुनौती, लेकिन संकल्प रहा मजबूत गांवों में खेतों का काम, शादी-ब्याह, नेटवर्क की दिक्कतें, दस्तावेजों की कमी जैसी समस्याएं हर बीएलओ के सामने थीं, लेकिन इन अधिकारियों ने हार नहीं मानी। कभी अलसुबह खेतों में जाकर वेरिफिकेशन किया, तो कभी देर रात तक बैठकर ऑनलाइन एंट्री की।


