राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर की एकलपीठ ने ट्राइबल सब-प्लान (TSP) क्षेत्र के 63 कॉन्स्टेबल की ट्रांसफर मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को उन्हें ट्राइबल इलाकों में तैनात करने के निर्देश दिए हैं। जस्टिस फरजंद अली ने अपने ‘रिपोर्टेबल जजमेंट’ में कहा कि मिनरल प्रोटेक्शन फोर्स के नाम पर विज्ञापन निकालकर चयन तो ट्राइबल क्षेत्रों के लिए किया गया, लेकिन सभी को जयपुर स्थित 14वीं बटालियन RAC में अटका देना वैध अपेक्षाओं के साथ खिलवाड़ है। आदिवासी जिलों के 63 कांस्टेबल्स की याचिका बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, प्रतापगढ़ समेत दक्षिणी राजस्थान के अनुसूचित/ट्राइबल इलाकों के 63 कॉन्स्टेबल्स ने 10 जुलाई 2019 को राज्य सरकार, ADG आर्म्ड बटालियन और 14वीं बटालियन RAC कमांडेंट के खिलाफ याचिका दायर की थी। ये सभी याचिकाकर्ता 20 जुलाई 2013 को निकले “कॉन्स्टेबल मिनरल प्रोटेक्शन फोर्स” के विज्ञापन में TSP श्रेणी के तहत चयनित हुए थे। बाद में इन्हें 19 जनवरी 2016 के आदेश से नियमित नियुक्ति मिली। उनका कहना था कि वे स्थायी रूप से TSP क्षेत्रों के निवासी हैं, फिर भी उनकी नियुक्ति नॉन-TSP कैडर में कर दी गई और आज तक उन्हें ट्राइबल इलाकों में तैनाती नहीं दी गई। 2013 की भर्ती में 1000 पदों में से 80 TSP क्षेत्र के आरक्षित याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में बताया कि 2013 की भर्ती में 1000 पदों में से 80 पद खास तौर पर TSP क्षेत्र के लिए आरक्षित थे। वे उसी श्रेणी में चुने भी गए। इसके बावजूद उन्हें मिनरल/ट्राइबल बेल्ट की बजाय जयपुर आदि नॉन-TSP क्षेत्रों में लगा दिया गया, जबकि बाद में जारी 10 नवंबर 2014, 16 जुलाई 2018 और 30 अगस्त 2018 के सर्कुलर साफ कहते हैं कि TSP निवासी कर्मचारी चाहें तो ट्राइबल इलाकों में ट्रांसफर के लिए विकल्प दे सकते हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने समय पर आवेदन दिए, जो 14वीं बटालियन RAC से फॉरवर्ड भी हुए, लेकिन आज तक कोई निर्णय नहीं हुआ, जबकि समान परिस्थिति वालों को ट्रांसफर का लाभ मिल चुका है, जो समानता के अधिकार का उल्लंघन है। सरकार व पुलिस प्रशासन का जवाब: उस समय की जरुरत पर नियुक्ति राज्य की ओर से पेश जवाब में कहा गया कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति उस समय की मेरिट, रिक्तियों और प्रशासनिक जरूरत के आधार पर नॉन-TSP क्षेत्रों में की गई थी। सरकार ने यह भी कहा कि 2014 और 2018 के सर्कुलर कर्मचारियों को केवल ‘विकल्प’ देने का मौका रखते हैं, कोई पूर्ण अधिकार नहीं देते। ट्रांसफर हमेशा प्रशासनिक विवेक और सेवा आवश्यकताओं पर निर्भर है। जवाब में यह दलील भी दी गई कि 19 मई 2018 की केन्द्रीय अधिसूचना केवल अनुसूचित क्षेत्रों की नई परिभाषा है, उससे प्रत्येक TSP निवासी कर्मचारी का स्वतः ट्रांसफर का अधिकार नहीं बनता और सीमित रिक्तियों के कारण सभी को समायोजित करना संभव नहीं था। कोर्ट ने क्या पाया, कहां मानी सरकार की चूक कोर्ट ने रिकॉर्ड देखते हुए माना कि सभी याचिकाकर्ता अधिसूचित ट्राइबल क्षेत्रों से आते हैं और भर्ती में उन्हें TSP/ट्राइबल आरक्षण के तहत मौका दिया गया था। जस्टिस फर्जंद अली ने नोट किया कि “कॉन्स्टेबल मिनरल प्रोटेक्शन फोर्स” शीर्षक के तहत खनन व ट्राइबल बेल्ट – जैसे डूंगरपुर, बांसवाड़ा, सलूंबर, उदयपुर, राजसमंद के लिए भर्ती दिखाई गई। लेकिन, हकीकत में न तो किसी को मिनरल प्रोटेक्शन फोर्स में लगाया गया और न ही ट्राइबल क्षेत्रों में पोस्ट किया गया। सबको 14वीं बटालियन RAC में लगाकर जयपुर जैसे दफ्तरों की सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के विज्ञापन से उम्मीदवारों के मन में यह वैध अपेक्षा बनती है कि उन्हें उन्हीं क्षेत्रों में तैनाती मिलेगी, जिसके लिए भर्ती की परिकल्पना की गई थी, खासकर जब वे स्वयं वहीं के निवासी हों। ‘लीजिटिमेट एक्सपेक्टेशन’ और ट्राइबल संवेदनशीलता पर टिप्पणी कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कोई भर्ती विशेष रूप से ट्राइबल/मिनरल क्षेत्रों से जोड़कर निकाली जाती है, तो चयनित उम्मीदवारों के मन में ‘लीजिटिमेट एक्सपेक्टेशन’ (वैध अपेक्षा) बनती है कि उनकी पोस्टिंग भी उन्हीं इलाकों में होगी। जस्टिस फर्जंद अली ने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता कमजोर एवं वंचित आदिवासी समुदायों से आते हैं, ऐसे में राज्य को उनसे किया गया वादा तोड़ने से पहले संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाना चाहिए था। कोर्ट के अनुसार, राज्य ऐसा आकर्षक वादा कर भर्ती तो नहीं कर सकता और बाद में बिना तर्कसंगत आधार के उसे पूरी तरह बदल दे। हाईकोर्ट का आदेश: कहां होंगे तैनात हाईकोर्ट ने सभी 63 याचिकाकर्ताओं को ट्राइबल क्षेत्र में भेजने का रास्ता साफ करते हुए निर्देश दिया कि इन सभी को महाराणा प्रताप बटालियन, प्रतापगढ़ में शिफ्ट करने पर विचार किया जाए और यदि प्रशासनिक आवश्यकता हो, तो उन्हें TSP क्षेत्र में आने वाले किसी भी जिले में समायोजित, ट्रांसफर या अस्थायी रूप से तैनात किया जा सकता है। कोर्ट ने साफ किया कि इस तरह का कदम न केवल सरकारी सर्कुलरों के उद्देश्य के अनुरूप है, बल्कि उन ट्राइबल कॉन्स्टेबल्स की वैध अपेक्षा और संवेदनशील पृष्ठभूमि का भी सम्मान करता है। इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने रिट पिटीशन को निस्तारित कर दिया।


