डिंडौरी में सोमवार को उत्कृष्ट विद्यालय परिसर में जिला स्तरीय गीता जयंती महोत्सव कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान छात्र-छात्राओं सहित लगभग 1100 लोगों ने गीता के 15वें अध्याय ‘पुरुषोत्तम योग’ का पाठ किया। कार्यक्रम में संत, जनप्रतिनिधि और अधिकारियों ने गीता के महत्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का समापन गीता आरती के साथ हुआ। अग्नि अखाड़ा महामंडलेश्वर संत आशुतोष चैतन्य ने अपने संबोधन में कहा कि गीता किसी धर्म विशेष के लिए नहीं, बल्कि सभी के लिए आवश्यक है। उन्होंने सरकार द्वारा गीता को पाठ्यक्रम में शामिल करने के निर्णय की सराहना की। संत चैतन्य ने कहा कि विदेशों में भी लोग गीता को अपना रहे हैं, और हर घर में गीता पढ़ी जानी चाहिए, क्योंकि यह संस्कार, ऊर्जा और आत्मविश्वास प्रदान करती है। स्वामी राम शरण पुरी ने कहा कि देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने गीता को आत्मसात किया था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि गीता का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार होना चाहिए, ताकि लोग इसे पढ़ें और इसके ज्ञान को समझें। गीता समाज में जीवन जीने की कला सिखाती शहपुरा विधायक ओमप्रकाश धुर्वे ने कहा कि गीता समाज में जीवन जीने की कला सिखाती है। उन्होंने गीता के सिद्धांतों का उल्लेख किया, जैसे ‘कर्म करो फल की चिंता मत करो’ और ‘क्या लेकर आए थे क्या लेकर जाओगे, खाली हाथ आए थे और खाली हाथ जाओगे’। विधायक ने अपनी व्यक्तिगत राय देते हुए यह भी कहा कि 50 वर्ष की आयु के बाद व्यक्ति को अपने लिए जीना चाहिए, क्योंकि जीवन भर लोग पैसा कमाने में लगे रहते हैं। इस कार्यक्रम में कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया, पुलिस अधीक्षक वाहिनी सिंह, जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी दिव्यांशु चौधरी और कार्यक्रम के नोडल अधिकारी डॉ. बिहारी लाल द्विवेदी सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। क्यों मनाई जाती है गीता जंयती मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान पूर्णावतार भगवान श्री कृष्ण ने युद्ध के मैदान में अर्जुन को गीता के अनमोल वचन सुनाए थे। यानि इसी दिन श्रीमद्भगवद गीता जन्म हुआ था। गीता जयंती का धार्मिक महत्व हिंदू धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथ गीता के श्लोक आज 21वीं सदी में भी लोगों को जीवन की सही राह दिखाने का काम करते हैं। इसमें धर्म के साथ कर्म का मर्म समाहित है। सही मायने में कहा जाए तो यह कर्म, भक्ति और ज्ञान का संगम है, जिसमें डुबकी लगाने वाले व्यक्ति को जीवन में जरूर सफलता मिलती है। भगवान श्री कृष्ण के द्वारा कहे गए गीता के अनमोल वचन व्यक्ति को कठिन समय में जीवन की सही राह दिखाने का काम करते हैं। गीता में कहा गया है कि किस तरह कठिन से कठिन समय में भी कर्म करते हुए धर्म का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। सही मायने में देखा जाए तो श्रीमद्भगवद गीता में जीवन की हम समस्या का समाधान मिलता है। गीता के प्रथम श्लोक का क्या है मर्म धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय. भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए उपदेशों से जुड़ी गीता के पहले श्लोक के पहले दो शब्द पर यदि गौर करें तो इसमें पूरी श्रीमद्भगवद गीता का सार समाहित है। ये दो शब्द हैं धर्मक्षेत्रे और कुरुक्षेत्रे। यह संदेश देता है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म के क्षेत्र में धर्म का अनुसरण करें। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि धर्म ही मनुष्य का पिता, माता, भाई, मित्र, रक्षक और स्वामी है। इसलिए कर्म करते हुए किसी भी सूरत में धर्म का साथ न छोड़ें। गीता के जरिए श्रीकृष्ण ने दिया है ये संदेश भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं – ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन:’, अर्थात व्यक्ति का सिर्फ कर्म करने पर अधिकार है फल पर नहीं. ऐसे में उसे कर्म को फल की इच्छा लिए हुए नहीं बल्कि कर्तव्य समझकर करना चाहिए। इसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण अपने भक्तों को गीता के जरिए संदेश देते हैं कि – ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:’ यानि पृथ्वी पर जब-जब धर्म की हानि और अधर्म बढ़ता है तो भगवान स्वयं पृथ्वी पर अवतार लेते हैं। श्री कृष्ण कहते हैं कि – ‘नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:’ यानि आत्मा अजर-अमर है और उसे न तो कोई शस्त्र काट सकता है और न ही आज उसे जला सकती है। भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट रूप से गीता के वचन में कहा है कि – ‘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्’ यानि वे सज्जन और अच्छे लोगों के कल्याण और दुर्जन लोगों के विनाश के लिए समय-समय पृथ्वी पर प्रकट होते हैं।


