निवाड़ी जिले के पावन तीर्थ ओरछा में अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव का आयोजन किया गया। रामराजा सरकार मंदिर प्रांगण में सोमवार सुबह 11:30 बजे से शुरू हुए इस महोत्सव में कलेक्टर जमुना भिड़े, जिला पंचायत सीईओ रोहन सक्सेना, जिला अध्यक्ष राजेश पटेरिया, नंदकिशोर नापित और नगर परिषद अध्यक्ष शिशुपाल राजपूत सहित कई जनप्रतिनिधि, अधिकारी, विद्यार्थी और आमजन शामिल हुए। मंदिर की घंटियों की ध्वनि, भजन और श्लोकों के उच्चारण से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। इस अवसर पर धर्म, कर्म और कर्तव्य के सार पर चर्चा की गई, जिसने उपस्थित लोगों को आध्यात्मिक अनुभव प्रदान किया। पंडित रामकृष्ण मिश्र ने छात्रों को गीता के मूल संदेश को समझने और जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने बच्चों को श्रीकृष्ण की सेना और कर्तव्य का संदेश बताते हुए कुरुक्षेत्र युद्ध का ऐतिहासिक उदाहरण दिया। इसमें बताया गया कि श्रीकृष्ण की सेना कौरवों की ओर से युद्ध लड़ रही थी, जबकि स्वयं श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बने थे। इस उदाहरण के माध्यम से विद्यार्थियों को समझाया गया कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। वक्ताओं ने जोर दिया कि संकट कितना भी बड़ा हो, धैर्य और धर्म मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए और अन्याय के विरुद्ध हर परिस्थिति में खड़े रहना चाहिए। वक्ताओं ने कहा कि गीता केवल युद्ध का ग्रंथ नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, संतुलन, कर्तव्यनिष्ठा, ईश्वर स्मरण और सकारात्मक जीवन का अद्वितीय संदेश देती है। यह हमें हर कठिन समय में अपने कर्म और कर्तव्य को निरंतर करते रहने की शिक्षा देती है। कार्यक्रम के अंत में सभी छात्रों और उपस्थित नागरिकों को प्रतिदिन कुछ समय निकालकर श्रीमद् भगवद गीता का पाठ करने की सलाह दी गई। वक्ताओं ने बताया कि गीता का अध्ययन मन को स्थिर करता है और जीवन के निर्णय लेने में मार्गदर्शन देता है। आयोजन समाप्त होने के बाद भी लोग गीता के श्लोकों पर चर्चा करते रहे। कार्यक्रम का संचालन कवि सुमित मिश्रा ने किया। क्यों मनाई जाती है गीता जंयती मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान पूर्णावतार भगवान श्री कृष्ण ने युद्ध के मैदान में अर्जुन को गीता के अनमोल वचन सुनाए थे। यानि इसी दिन श्रीमद्भगवद गीता जन्म हुआ था। गीता जयंती का धार्मिक महत्व हिंदू धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथ गीता के श्लोक आज 21वीं सदी में भी लोगों को जीवन की सही राह दिखाने का काम करते हैं। इसमें धर्म के साथ कर्म का मर्म समाहित है। सही मायने में कहा जाए तो यह कर्म, भक्ति और ज्ञान का संगम है, जिसमें डुबकी लगाने वाले व्यक्ति को जीवन में जरूर सफलता मिलती है। भगवान श्री कृष्ण के द्वारा कहे गए गीता के अनमोल वचन व्यक्ति को कठिन समय में जीवन की सही राह दिखाने का काम करते हैं। गीता में कहा गया है कि किस तरह कठिन से कठिन समय में भी कर्म करते हुए धर्म का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। सही मायने में देखा जाए तो श्रीमद्भगवद गीता में जीवन की हम समस्या का समाधान मिलता है। गीता के प्रथम श्लोक का क्या है मर्म धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय. भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए उपदेशों से जुड़ी गीता के पहले श्लोक के पहले दो शब्द पर यदि गौर करें तो इसमें पूरी श्रीमद्भगवद गीता का सार समाहित है। ये दो शब्द हैं धर्मक्षेत्रे और कुरुक्षेत्रे। यह संदेश देता है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म के क्षेत्र में धर्म का अनुसरण करें। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि धर्म ही मनुष्य का पिता, माता, भाई, मित्र, रक्षक और स्वामी है। इसलिए कर्म करते हुए किसी भी सूरत में धर्म का साथ न छोड़ें। गीता के जरिए श्रीकृष्ण ने दिया है ये संदेश भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं- ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन:’, अर्थात व्यक्ति का सिर्फ कर्म करने पर अधिकार है फल पर नहीं. ऐसे में उसे कर्म को फल की इच्छा लिए हुए नहीं बल्कि कर्तव्य समझकर करना चाहिए. इसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण अपने भक्तों को गीता के जरिए संदेश देते हैं कि – ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:’ यानि पृथ्वी पर जब-जब धर्म की हानि और अधर्म बढ़ता है तो भगवान स्वयं पृथ्वी पर अवतार लेते हैं. श्री कृष्ण कहते हैं कि – ‘नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:’ यानि आत्मा अजर-अमर है और उसे न तो कोई शस्त्र काट सकता है और न ही आज उसे जला सकती है। भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट रूप से गीता के वचन में कहा है कि – ‘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्’ यानि वे सज्जन और अच्छे लोगों के कल्याण और दुर्जन लोगों के विनाश के लिए समय-समय पृथ्वी पर प्रकट होते हैं।


