भर्ती प्रक्रिया के दौरान हुईं विधवा,नहीं मिलेगा आरक्षण का लाभ:हाईकोर्ट- ‘आवेदन की अंतिम तारीख ही पात्रता का आधार, बीच में बदला स्टेटस मान्य नहीं’

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सरकारी भर्ती प्रक्रिया के दौरान यदि किसी महिला अभ्यर्थी के पति की मृत्यु हो जाती है, तो उसे विधवा श्रेणी के आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता। पात्रता का निर्धारण आवेदन की अंतिम तारीख के आधार पर ही होगा। जस्टिस मन्नूरी लक्ष्मण की एकलपीठ ने सरोज शर्मा की याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। पाली जिले के निमाज निवासी सरोज शर्मा ने एलडीसी भर्ती-2013 में श्रेणी बदलाव की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि “खेल शुरू होने के बाद बीच में नियम नहीं बदले जा सकते”। 2013 में जनरल कैटेगरी में किया था आवेदन 12 फरवरी 2013 को LDC (लोअर डिवीजन क्लर्क) पद के लिए विज्ञापन जारी किया था, जिसमें आवेदन की अंतिम तिथि 22 मार्च 2013 थी। याचिकाकर्ता सरोज शर्मा ने 13 अप्रैल 2013 को अनारक्षित महिला (जनरल फीमेल) कैटेगरी में आवेदन किया था। विज्ञापन में विधवा महिलाओं के लिए अनारक्षित (विधवा) कैटेगरी में आरक्षण का प्रावधान था, लेकिन सरोज ने उस कैटेगरी में आवेदन नहीं किया क्योंकि आवेदन की अंतिम तिथि पर उनके पति जीवित थे।​ भर्ती प्रक्रिया लंबी चली और इसी दौरान 19 दिसंबर 2022 को सरोज के पति का निधन हो गया। मूल चयन सूची में उन्हें न तो अनारक्षित महिला कैटेगरी में और न ही विधवा कैटेगरी में योग्य पाया गया। 17 नवंबर 2022 के संचार द्वारा प्रतिवादियों ने 12 फरवरी 2013 के विज्ञापन की चयन प्रक्रिया में खाली पदों को भरने का निर्णय लिया।​ 52.739 अंक के बावजूद नहीं मिला लाभ सरोज शर्मा को 52.739 अंक मिले थे, जबकि अनारक्षित विधवा कैटेगरी में 32.846 अंक वाली उम्मीदवार का चयन हो गया था। चूंकि सरोज के अंक चयनित उम्मीदवार से अधिक थे, इसलिए उन्होंने 12 जनवरी 2023 को प्रतिवादियों को रिप्रेंजेशन भेजकर अपनी कैटेगरी अनारक्षित महिला से बदलकर अनारक्षित विधवा में करने का अनुरोध किया, जिसे विभाग ने नहीं माना। तब सरोज ने रिट याचिका दायर की।​ अप्रत्याशित घटना, पुराने फैसलों का भी दिया हवाला याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि पति की मृत्यु एक अप्रत्याशित घटना थी जो भर्ती प्रक्रिया के दौरान हुई। उन्होंने ‘जमुना राजपुरोहित’ और ‘संगीता जोशी’ जैसे पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में मानवीय आधार पर श्रेणी बदलाव की अनुमति मिलनी चाहिए। सरकारी वकील का जवाब: कट-ऑफ डेट पर पात्र नहीं थीं सरकार की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि पात्रता का निर्धारण आवेदन की अंतिम तारीख 22 मार्च 2013 के आधार पर होना चाहिए। उस दिन याचिकाकर्ता विधवा श्रेणी के लिए पात्र नहीं थीं। उन्होंने कहा कि 9 साल बाद पात्रता हासिल करने पर नियमों में बदलाव नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा- भावनाएं नियमों से ऊपर नहीं जस्टिस मन्नूरी लक्ष्मण ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि कानून का यह तय सिद्धांत है कि पात्रता का निर्धारण विज्ञापन में दी गई कट-ऑफ तारीख या आवेदन की अंतिम तारीख से ही होता है। कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा– “याचिकाकर्ता आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि पर विधवा श्रेणी के तहत आरक्षण प्राप्त करने की पात्रता पूरी नहीं करती थीं। चयन प्रक्रिया के दौरान पात्रता हासिल करने के आधार पर उन्हें अपनी श्रेणी बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती।” कानूनी नजीर: पुराना फैसला ‘पर इनक्यूरियम’ कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए पुराने फैसलों के हवाले को नकार दिया। कोर्ट ने कहा कि वे फैसले सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी सिद्धांतों पर विचार किए बिना दिए गए थे, इसलिए वे ‘पर इनक्यूरियम’ (Per incuriam) हैं। ‘Per incuriam’ एक कानूनी शब्द है जिसका अर्थ है कि फैसला देते समय कानून के महत्वपूर्ण बिंदुओं या उच्च अदालत के आदेशों की अनदेखी की गई हो। याचिका में राजस्थान सरकार, ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभाग तथा पाली, जोधपुर, जालौर, भीलवाड़ा, सिरोही, जैसलमेर और नागौर जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों को प्रतिवादी बनाया गया था। कोर्ट ने 26 नवंबर को फैसला सुरक्षित रखा और 1 दिसंबर को सुनाया।​

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *