भोपाल की यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री…यही वो फैक्ट्री है, जिसने 41 साल पहले 24 घंटे में 3787 लोगों की जान ले ली थी। कुल 35 हजार मौतें हुई थीं। इतिहास के पन्ने में यह गैस कांड दुनिया की सबसे बड़ी गैस त्रासदी में रूप में दर्ज है। फैक्ट्री का कचरा पीथमपुर में ले जाकर नष्ट कर दिया गया, लेकिन अब इस फैक्ट्री में घूमने-घुमाने का बड़ा खेल चल रहा है। जिनके ऊपर इस जगह की सुरक्षा का जिम्मा है, वे ही चंद रुपयों के खातिर फैक्ट्री में आसानी से भ्रमण करवा देते हैं। यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में तैनात होमगार्ड का स्पष्ट कहना है- ‘आप जैसे बहुत आते हैं, लेकिन परमिशन का नियम है। इसके बाद हम प्रोजेक्ट पूरा करवा देते हैं। हमारा काम ही यही है। नहीं तो 500 रुपए जमा करो इधर, हेड साहब की जेब में। समझ रहे हो न, दुनिया में दो रास्ते रहते हैं। एक सीधा-सीधा और एक’… दैनिक भास्कर ने स्टिंग करके पूरे खेल का खुलासा किया है। दो रिपोर्टर फैक्ट्री में गए और तैनात दो गार्ड से अंदर जाने की बात कहने लगे। पहले तो गार्ड ने परमिशन लाने का बोला, लेकिन बातों ही बातों में घूमने के लिए 500 रुपए की मांग कर डाली। एक गार्ड ने पैसों की बात की और दूसरे ने मोटरसाइकिल से घुमाया। हालांकि, अंदर घूमने के दौरान भास्कर रिपोर्टर ने पूरी सावधानी बरती। फैक्ट्री के अंदर न जाते हुए कुछ दूर से ही वापस भी आ गए।
यह पूरा खेल कैमरे में भी कैद हो गया। लेन-देन, फिर अंदर जाने और रुपए लेने का जानिए पूरा खेल…। 3 दिन घूमी टीम, बच्चों ने किया खुलासा
भास्कर टीम 3 दिन तक फैक्ट्री और आसपास के इलाके में घूमती रही। इस दौरान कई चौंकाने वाली बातें भी सामने आईं। जेपी नगर के ठीक सामने ही फैक्ट्री कैम्पस है। कहने को तो जिला प्रशासन ने कैम्पस के चारों ओर दीवारें बनवा दी, लेकिन ग्राउंड में हर रोज लोगों की आवाजाही लगी रहती है। खासकर बच्चों की, जो यहां खेलने पहुंचते हैं। वे भी बिना रोक-टोक के फैक्ट्री की मशीनों के पास पहुंच जाते हैं। जिन्हें रोकने वाला कोई नहीं होता। इन्हीं में से कुछ बच्चों ने इस मामले का खुलासा किया। बच्चों ने बताया कि 400-500 रुपए लेकर वे इस रास्ते से किसी को भी अंदर ले जाते हैं। हम अकेले हैं तो कोई नहीं रोकता, लेकिन यदि कोई साथ जाता है तो उसके बदले में गार्ड को रुपए दे देते हैं। बच्चों की इस बात की सच्चाई जानने के लिए ही भास्कर रिपोर्टर स्टूडेंट बनकर गार्ड के पास पहुंचे और घूमने के एवज में रुपए दिए। इस बारे में कलेक्ट्रेट की गैस राहत शाखा प्रभारी एवं डिप्टी कलेक्टर अजय शर्मा ने बताया कि पिछले 11 महीने से ऑफिस से अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई है। यदि कोई रुपए लेकर ऐसा कर रहा है तो कार्रवाई करेंगे। जनवरी में पीथमपुर पहुंचा था 337 टन जहरीला कचरा
यूका फैक्ट्री का 337 मीट्रिक टन जहरीला कचरा इसी साल जनवरी में 40 साल बाद हटा था। 12 कंटेनर के जरिए हाई सिक्योरिटी के बीच कचरा पीथमपुर ले जाया गया था। यहां लंबे विरोध प्रदर्शन के बाद यह कचरा जलाया गया था, लेकिन फैक्ट्री में अब भी हजारों टन कचरा दफन होने की बात गैस पीड़ित संगठन कह रहे हैं। इसे लेकर लंबे समय से गैस पीड़ितों के लिए काम कर रही रचना ढिंगरा ने बताया कि 126 करोड़ रुपए खर्च करने के बाद 337 टन कचरे को ट्रिपलिंग कर दिया गया, लेकिन हजारों टन कचरा अब भी जमीन में दफन है। कारखाने के अंदर 21 जगह पर कचरा आज भी दबा हुआ है। यूनियन कार्बाइड के पीछे 400 मीटर की दूरी पर 3 जहरीले तालाब यूनियन कार्बाइड ने बनाए थे। जिसे सोलर इवेपॉरेशन पॉन्ड कहते हैं। वह तालाब आज भी हैं और उस तालाब में सरकारी एस्टीमेट के हिसाब से मिलियंस ऑफ टन कचरा आज भी दबा हुआ है, जिसकी वजह से 42 बस्तियों का भूजल प्रदूषित हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि इन बस्तियों में साफ पानी दिया जाए। वह इसी कचरे की वजह से हुआ है, जो आज भी तालाब में गड़ा हुआ है और कारखाने के अंदर है। भोपाल गैस कांड दुनिया की सबसे बड़ी गैस त्रासदी
भोपाल गैस त्रासदी। करीब 41 साल पहले। 2-3 दिसंबर 1984 की वो रात। JP नगर में यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के प्लांट नंबर-CK टैंक नंबर-610 से लीक हुई मिथाइल आइसोसाइनेट ने हजारों परिवारों को तबाह कर दिया। आज की पीढ़ी ने उस भयानक रात के बारे में सिर्फ सुना या तस्वीरों में देखा होगा। यकीन मानिए कि वह रात दुनिया की सबसे खौफनाक रातों में से एक है। गूगल सर्च इंजन भी मानता है कि दुनिया में उससे पहले और उसके बाद आज तक ऐसा कोई भी इंडस्ट्रियल डिजास्टर नहीं हुआ है, जो भोपाल गैस त्रासदी के दुख-दर्द और नुकसान के बराबर हो। इस घटना को करीब से देखने वाले और कवर करने वाले बताते हैं कि लाशें ही लाशें थीं, जिन्हें ढोने के लिए गाड़ियां कम पड़ गईं। चीखें इतनी कि लोगों को आपस में बातें करना मुश्किल हो रहा था। धुंध इतनी कि पहचानना ही चैलेंज था उस रात। भोपाल कांड की देखिए तस्वीरें… भोपाल गैस त्रासदी या गैस कांड क्या था?
भोपाल में अमेरिका की यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन ने 1969 में यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड का प्लांट शुरू किया था। इस फैक्ट्री में मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) और अल्फा नेफ्थॉल के फॉर्मूलेशन से सेविन ब्रांड का कीटनाशक बनाया जाता था। MIC इतना खतरनाक था कि अमेरिका इसे एक-एक लीटर की स्टील की बोतलों में दूसरे देशों को सप्लाई करता था, लेकिन नियमों को ताक पर रखकर भारत में इसे स्टील के कंटेनरों में अमेरिका से मंगाया जाता था। 1978 में भोपाल के फैक्ट्री परिसर में अल्फा नेफ्थॉल और 1979 में MIC बनाने की यूनिट लगाई गई थी। एमआईसी का स्टोरेज टैंक 610 अपनी क्षमता से अधिक भरा हुआ था। 2 दिसंबर की रात 8.30 बजे ठोस अपशिष्ट से भरे पाइपों को पानी से साफ किया जा रहा था। यह पानी लीक वाल्वों के कारण एमआईसी टैंक में घुसने से टैंक में ‘रन अवे रिएक्शन’ शुरू हो गया, जिस कारण टैंक 610 फट गया और उसमें मौजूद एमआईसी गैस हवा में लीक हो गई। रातभर में ही गैस के रिसाव से 3828 लोग मारे गए। 2003 तक 15,000 से ज्यादा मौत होने के दावे किए गए। 30,000 से अधिक लोग हादसे से प्रभावित हुए थे। यह आंकड़ा अब 5.5 लाख हो गया है।


