राजधानी में राशन दुकानों से गरीबों को मिलने वाले चावल की अवैध बिक्री का एक बड़ा गोरखधंधा पकड़ा गया है। खाद्य एवं आपूर्ति विभाग की टीम महीनों से निगरानी कर रही थी। जांच में दो व्यापारियों राजकुमार ट्रेडर्स के राजकुमार आसवानी के यहां से 450 क्विंटल और महालक्ष्मी ग्रेन मार्ट के बिनोद रिझवानी के गोदाम से कुल 53 क्विंटल पीडीएस का चावल बरामद किया गया। यह चावल अलग-अलग मिलों में प्रोसेस कर बाजार में महंगे दाम पर बेचने की तैयारी की जा रही थी। चौंकाने वाली बात यह रही कि 15 लाख रुपए से अधिक कीमत का यह पूरा स्टॉक जब्त करने के बाद एडीएम अंकुर मेश्राम ने सिर्फ 30 हजार रुपए का मामूली जुर्माना लगाकर चावल वापस कर दिया। इस फैसले ने प्रशासनिक हलकों से लेकर आम जनता तक, कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लैब रिपोर्ट में साबितः यह चावल पीडीएस का ही था
जांच के बाद चावल के नमूने नागरिक आपूर्ति निगम की लैब में भेजे गए थे। रिपोर्ट में साफ हो गया कि यह वही चावल है, जिसे गरीब परिवारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत दिया जाता है। व्यापारी न तो ऐसा चावल वैध रूप से खरीद सकता है और न ही बिना अनुमति इसके भंडारण का अधिकार रखता है यानी मामला पूरी तरह अवैध गतिविधि का था। फूड डिपार्टमेंट की मेहनत पर पानीः जांच में सामने आया कि चावल अवैध रूप से खरीदा गया। स्टोरेज बिन अनुमति के किया गया। पूरा नेटवर्क सप्लाई चेन में बड़े स्तर की गड़बड़ी की ओर संकेत कर रहा था। फिर भी एडीएम कोर्ट से सिर्फ 30 हजार रुपए का जुर्माना व पूरा चावल वापस करने का आदेश जारी हुआ। सूत्रों के मुताबिक यह फैसला गरीबों के राशन की सुरक्षा व भविष्य में होने वाली कार्रवाई दोनों को कमजोर कर सकता है। अब बड़ा सवाल
15 लाख से अधिक के स्टॉक पर सिर्फ 30 हजार का जुर्माना
जब जांच और लैब रिपोर्ट में साफ साबित हो गया कि चावल पीडीएस का है तो इतने बड़े घोटाले में सिर्फ 30 हजार का जुर्माना लगाकर पूरा चावल वापस क्यों कर दिया गया? क्या यह कानून के प्रावधानों के विपरीत नहीं? विभाग की महीनों की जांच के बावजूद ऐसा फैसला कैसे हुआ? यह मामला न सिर्फ प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल उठाता है। अवैध खरीद-बिक्री पर 3 महीने से 7 साल की जेल का प्रावधान
कानून क्या कहता हैः आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत पीडीएस चावल का अवैध भंडारण (खरीद-बिक्री) करने पर धारा 7 के तहत सख्त सजा का प्रावधान है। कम से कम 3 महीने या अधिकतम 7 साल तक का कठोर कारावास, साथ में भारी जुर्माना और कई मामलों में एफआईआर व गिरफ्तारी भी अनिवार्य होती है। इतना गंभीर मामला होने के बावजूद, कार्रवाई सिर्फ मामूली जुर्माने तक सीमित रहने से विभागीय जांच की महीनों की मेहनत पर भी सवाल उठ रहे हैं। नियमानुसार जुर्माना लगाया
फूड विभाग के केस में कुछ त्रुटियां थीं। आरोपियों के वकीलों ने उन्हीं के आधार पर दलीलें दीं। नियमानुसार जुर्माना लगाया गया। वर्तमान में मेरे पास फूड विभाग का प्रभार नहीं है। – अंकुर मेश्राम, एडीएम


