आर्थिक विवाद को अपराध नहीं माना जा सकता:ग्वालियर हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में FIR रद्द की

ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने आंतरी थाना क्षेत्र में दर्ज आत्महत्या के लिए उकसाने की एक एफआईआर रद्द कर दी है। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि केवल आर्थिक लेनदेन के विवाद या सामान्य कहासुनी को अपराध का रूप नहीं दिया जा सकता। बता दें कि यह मामला 28 अक्टूबर 2024 का है, जब आंतरी के पास रेलवे ट्रैक पर रीता नामक एक महिला का शव मिला था। मर्ग जांच के दौरान परिवार ने आरोप लगाया था कि प्रवीण शाक्य नामक आरोपी को सरकारी नौकरी लगवाने के नाम पर 4.25 लाख रुपए दिए गए थे। परिजनों के अनुसार, जून 2024 तक नौकरी न मिलने पर पैसे वापस मांगने को लेकर प्रवीण शाक्य से विवाद हुआ था। परिवार का आरोप था कि इसी मानसिक तनाव के कारण रीता ने ट्रेन के सामने कूदकर आत्महत्या कर ली। इस मर्ग के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत मामला दर्ज किया गया था। वकील ने कहा – मामला पूरी तरह सिविल विवाद, अपराध नहीं बनता आरोपी प्रवीण शाक्य के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि यह पूरा मामला आर्थिक लेनदेन का एक सिविल विवाद है और इससे आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनता। न्यायालय ने भी रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस तथ्य नहीं पाया, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने महिला को आत्महत्या के लिए उकसाया था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने एफआईआर, चार्जशीट और आगे की सभी कार्रवाई को निरस्त कर दिया। वकील का कहना था कि परिजनों के बयान ही पूरे मामले का आधार है, जबकि न कोई सुसाइड नोट न कोई अन्य सबूत और न ही उकसावे जैसा कोई प्रत्यक्ष कृत्य सामने आया है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आत्महत्या के लिए उकसावे में स्पष्ट सक्रिय और निकट या सहायता होना अनिवार्य है। केवल आर्थिक विवाद, अपमान या तनाव को स्वतः अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

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