चपरासी का इंटरव्यू देने गया, क्रिकेटर बनकर लौटा:चेहरा तक नहीं देखना चाहते थे लोग, होटल में बर्तन धोए; अब भारतीय दिव्यांग टीम में सिलेक्शन

बड़वानी जिले के छोटे से गांव मोरतलाई के दिव्यांग श्रेणी के ऑलराउंडर जितेंद्र वाघ का चयन भारतीय दिव्यांग क्रिकेट टीम में हुआ है। 30 नवंबर को भारतीय दिव्यांग क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ऑफ इंडिया ने सिलेक्शन लिस्ट जारी की है। उसका चयन भारत और नेपाल के बीच रांची (झारखंड) में खेले जाने वाले तीन T-20 मैचों के लिए हुआ है। ये मैच 13, 14 और 16 दिसंबर को खेले जाएंगे। मजदूर परिवार में पले-बढ़े जितेंद्र वाघ के घर लोगों का आना–जाना बना हुआ है। इसके बाद दैनिक भास्कर की टीम उसके घर पहुंची। उसके क्रिकेटर बनने की कहानी भी रोचक है। कभी लूला कहते थे, अब फोटो खिंचवा रहे
मोर तलाई गांव में नाले के पास बना कच्चा घर जितेंद्र वाघ का है। वह यहां परिवार के साथ रहते हैं। कुछ साल पहले तक लोग इस घर के सामने से आना-जाना भी पसंद नहीं करते थे। वजह थी, इस घर के एक लड़के का दिव्यांग होना। उसका दाहिना हाथ छोटा और टेड़ा था। गांव के बच्चे हो या बड़े उसे ‘लूला’ कहते थे। कभी वो अगर कहीं दिख जाए, तो लोग ऐसे नजर बचाकर निकलते थे, जैसे कुछ देखा ही न हो। आज उसी घर के सामने लोगों का मजमा लगा है। दूर-दूर से लोग गुलदस्ते और मिठाई लेकर आ रहे हैं। साथ में फोटो खींचने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। लोगों का आना-जाना अब भी जारी है। लोग फोटो खिंचवाने के बाद तुरंत उसे अपने सोशल मीडिया पर शेयर भी कर रहे हैं। लगान फिल्म ने जीवन बदल दिया
जितेंद्र कहते हैं कि सुबह से ही कई लोग आ गए थे, नाश्ता तक नहीं किया है। हमने बात काटते हुए कहा- क्यों नहीं आएंगे, आपने तो मध्य प्रदेश का नाम रोशन किया है। पूछा- आप इस मुकाम पर पहुंच गए हैं, जो हर क्रिकेट खेलने वाले का सपना होता है। कैसा लग रहा है? यह सुनते ही जितेंद्र कुछ सोचने लग गए। फिर कहते हैं, कुछ आसान नहीं था। दिव्यांग हूं। बचपन किन मुश्किलों में बीता, मैं ही जानता हूं। लोग बात करना तक पसंद नहीं करते थे। घर से बाहर तक जाने की इच्छा नहीं होती थी, लेकिन 15 जून 2001 रिलीज हुई एक्टर आमिर खान की ‘लगान’ फिल्म ने मेरे अपने बारे में सोचने का तरीका बदल दिया। मेरी हालत भी फिल्म के किरदार ‘कचरा’ की तरह थी। ये किरदार आदित्य लाखिया ने निभाया है। मेरी हालत भी फिल्म के किरदार जैसी थी
जितेंद्र बताते हैं कि जब फिल्म रिलीज हुई, तब मैं 10 साल का था। एक और बात थी। लगान 15 जून को रिलीज हुई और मेरी डेट ऑफ बर्थ 14 जून है। बचपन से ही क्रिकेट खेलने का शौक था। घर में भाई-बहन के साथ कपड़े धोने की मोगरी और कपड़े की बॉल से खेलता था। कभी-कभार मोहल्ले और स्कूल के बच्चे अपने साथ खिला लेते थे। जब फिल्म रिलीज हुई, तो टीवी पर कचरा वाला सीन देखा। उसका हाथ भी मेरे जैसा था। उसकी वजह से फिल्म में आमिर खान की टीम जीती थी। उसी वक्त, मैंने भी ठान लिया कि अब मुझे भी कुछ करना है। फिर क्या था जब, जहां जैसा मौका मिल जाए, क्रिकेट खेलने लगा। अगर कोई नहीं खिलाता, तो ग्राउंड के बाहर बैठ जाता था। बॉल मेरे पास आती, तो उसे उठाकर प्लेयर को थ्रो करता या बॉलिंग कर उसे वापस कर देता। जितेंद्र कहते हैं कि बचपन से ही राइट हैंड में पोलियो था। माता-पिता ने काफी इलाज कराया। फायदा कुछ नहीं हुआ। पिता का इलेक्ट्रिक मोटर वाइंडिंग का काम है। हम पांच भाई-बहनों में सबसे छोटा हूं। मां का तो पूरा समय हमारी देखभाल में ही निकल जाता है। बड़ा परिवार था, घर के हालात कभी अच्छे नहीं रहे। पांचवी तक स्कूल गया। इसके बाद पिताजी के काम में मदद करने लगा। मैंने तो परिवार की खातिर होटलों तक में बर्तन धोए हैं। हालांकि पढ़ाई नहीं छोड़ी। 10-12वीं की परीक्षा प्राइवेट दी। दोनों ही परीक्षाओं में प्रथम आया। चपरासी का इंटरव्यू देने गया था, फिर…
जितेंद्र बताते हैं कि साल 2016-17 की बात है। मैं भी 17 साल का हो गया था। गांव में पिताजी का काम ठीक से नहीं चल रहा था। मुझे भी लोग मेरे हाथ के कारण काम नहीं देते थे। उसी समय अखबार में भोपाल के प्राइवेट ऑफिस में चपरासी की जगह निकली। मेरे पास तो भोपाल जाने तक के पैसे नहीं थे। भोपाल भी पहली बार जाना था। मां मुझे बाहर भेजने तैयार नहीं थी, लेकिन जब उन्हें समझाया तो मान गईंं। उन्होंने अपनी गुल्लक में जो 100-150 रुपए इकट्‌ठा किए थे, वो भोपाल जाने के लिए मुझे दे दिए। तारीख तो याद नहीं। रात में यहां से निकला था। सुबह-सुबह भोपाल पहुंच गया। वहां न्यू मार्केट इलाके में वो ऑफिस था, जहां चपरासी का इंटरव्यू देने जाना था। बस स्टैंड से पैदल-पैदल करीब छह-सात किलोमीटर दूर 10 बजे के करीब में न्यू मार्केट पहुंच गया। इंटरव्यू भी हो गया। ऑफिस वालों ने दो-चार दिन में खबर भेजने को कहा। बहुत भूख लगी थी, तो न्यू मार्केट में ही एक दुकान पर नाश्ता करने लगा। वहां कुछ मेरे ही तरह दिव्यांग लड़के नाश्ता कर रहे थे। बातचीत में पता चला कि स्टेडियम में दिव्यांग क्रिकेटरों का एमपी की टीम के लिए ट्रायल चल रहा है। मैंने उनसे बात की। उनके साथ ही स्टेडियम आ गया। हैदराबाद खेलने गया, वो बना टर्निंग पॉइंट
भोपाल के स्टेडियम में दोपहर करीब दो बजे के करीब मेरा ट्रायल हुआ। इसे खुश किस्मती ही कहेंगे कि सिलेक्शन एमपी टीम में हो गया। मैं गया तो चपरासी बनने था, पर एमपी क्रिकेट टीम का सदस्य बनकर वापस घर पहुंचा। मां बहुत खुश हुई। कुछ दिन एमपी टीम के साथ हैदराबाद खेलने गया। यहां 24 राज्यों की टीमें आई थीं। एमपी की टीम चौथे नंबर पर रही थी। हैदराबाद में मुझे दिव्यांग पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा से मिलने का मौका मिला। उनसे मिलना आश्चर्य से कम नहीं था। हाथ की परेशानी तो अब शुरू हुई थी। अब तक टेनिस बाल से खेलता आ रहा था। टीम में आने के बाद लेदर बॉल से खेलने लगा। इसकी आदत नहीं थी। कई बार चोट लगी। ऐसे ही एक मैच में मेरा वही हाथ फ्रैक्चर हो गया, जिसकी वजह से मैं दिव्यांग कहलाता था। सर्जरी के बाद मुझे करीब एक साल तक मैदान से बाहर रहना पड़ा। पहले बॉलिंग करता था, इससे दिक्कत होती थी, लेकिन प्रैक्टिस से सब ठीक होता गया। इसके बाद ऑलराउंडर की कैटेगरी में आ गया हूं। जितेंद्र कहते हैं कि मुझे कविता सुनने और पढ़ने का भी शौक है। कवि हरिवंश राय बच्चन की कविताओं की किताबें उनके पास हैं। बच्चन जी की एक कविता तो मुझे हमेशा प्रेरणा देती है। इसे मैंने अपने जीवन का ध्येय भी बना लिया है… “कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती”। दोस्त भी खुश, बोले- काबिलियत से हासिल किया मुकाम
जितेंद्र के भारतीय टीम में सिलेक्शन के बाद उनके दोस्त भी काफी खुश हैं। उनके साथी डॉ. संदीप पाटिल, प्रकाश चोपड़ा और श्याम कहते हैं कि उसने अपनी मेहनत, जोश और काबिलियत के दम पर ये मुकाम हासिल किया है। आज हमारे जिले और गांव का नाम देश में रोशन हो गया। भाजपा जिला उपाध्यक्ष राम सोनोने कहा कि सरकार से हर संभव मदद की कोशिश करेंगे।

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