“नाम जपो, किरत करो और वंड छको’ का सिद्धांत अपना 3 साल से हर रविवार शहीदां साहिब में 3 हजार लोगों को लंगर छका रहे…

सेवा और सफलता के लिए संसाधनों का होना जरूरी नहीं बल्कि इसके लिए मन में भाव और संकल्प होना चाहिए। ऐसे ही सेवा भाव की मिसाल हैं कोट बाबा दीप सिंह निवासी फल विक्रेता 56 वर्षीय हरजिंदर सिंह। यद्यपि उनका कारोबार बहुत बड़ा नहीं है लेकिन मानवता की सेवा में उनका दिल करोड़पति कारोबारियों से भी बड़ा है। करीब एक दशक से मानवता की सेवा में रमे हरजिंदर ही नहीं बल्कि अब उनके दो बेटे और दो भतीजे भी सिखी की सेवा परंपरा को निभा रहे हैं। यह सिलसिला एक-दो नहीं बल्कि गत 10 साल से जारी है। यह परिवार विभिन्न माध्यमों से सेवा पर सालाना 4 लाख से अधिक खर्च देता है। इसमें उनके परिवार के अलावा दानी जन भी मदद करते हैं। हरजिंदर सिंह का कहना है कि जरूरतमंदों की मदद करके दिल को जो सुकून मिलता है उसे बयां नहीं कर सकते। 15 साल में पिता को जरूरमतदों की मदद करते देखा तो उनके मन में सेवा की भावना जागी और तब से जरूरतमंदों की मदद से कभी पीछे नहीं हटे। हरजिंदर सिंह ने बताया कि उनके पिता हरभजन सिंह परिवार पालन के लिए घर के बाहर और गुरुद्वारा शहीदां साहिब के सामने फल की रेहड़ी लगाते थे। चूंकि परिवार में माता-पिता के अलावा 4 भाई थे, नतीजतन बड़ी मुश्किल से गुजारा होता था। यही कारण है कि 8वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद 15 साल की उम्र में वह पिता के काम में हाथ बंटाने लगे। काम के दौरान अकसर पिता जरूरतमंदों की मदद करते थे। जैसे किसी श्रद्धालु के पास किराया अथवा खाने को नहीं तो वह कमाई में से मदद कर दिया करते थे। पिता जी के इस काम से वह भी प्रभावित हुए और खुद से भी सेवा करने लगे। हरजिंदर सिंह ने बताया कि आगे शादी हुई और बच्चे हुए तो उन पर जिम्मेदारी और बढ़ गई। घर चलाने और सेवा के लिए काम का थोड़ा विस्तार किया। इसके साथ ही बाबा नानक के सिद्धांत “नाम जपो, किरत करो और वंड छको’ को जिंदगी में उतार लिया। वह कहते हैं कि साल 2014 से उन्होंने संकल्प ले लिया कि अपनी कमाई का दसवंद सेवा में खर्चेंगे। इसके बाद काम बढ़ा तो उनके दोनों बेटे संदीप, बलवंत और भतीजे जतिंदर तथा गुरप्रीत भी काम के साथ-साथ सेवा में हाथ बंटाने लगे। वह कहते हैं कि आज गुरु महाराज की कृपा से अच्छा काम चल रहा है। हरजिंदर और उनके बेटे तथा भतीजे बताते हैं कि वह लोग बेटियों की शादी, बच्चों की पढ़ाई, बीमारों के इलाज में भी मदद करते हैं। अब तक 100 के करीब बेटियों की शादी और 500 बच्चों की पढ़ाई में मदद कर चुके हैं। इसके अलावा अगर किसी बीमार के पास इलाज को पैसे न हों तो सामर्थ् यानुसार उसकी भी मदद करते हैं। उक्त का कहना है कि पूरे कोरोना काल में उनके परिवार ने रोजाना 300 परिवारों घर पर खाना पहुंचाया। इसी तरह से गत 3 साल से हर रविवार को शहीदां साहिब में चौपहरा पाठ के दौरान 3000 लोगों के लिए लंगर की व्यवस्था करते हैं।

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