बीकानेर में इस समय सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि फसल कैसी होगी, बल्कि यह है कि फसल बचेगी कैसे? रबी सीजन की चरम तैयारी के बीच किसान यूरिया की किल्लत से जूझ रहे हैं। सुबह से लेकर देर शाम तक सहकारी समितियों और निजी डीलरों के बाहर लगी लंबी कतारें इस संकट की गंभीर तस्वीर पेश कर रही हैं। तेजरासर, डाइयां, नौरंगदेसर, कोलायत से लेकर बीकानेर शहर तक हर जगह किसानों की एक ही चिंता है, यूरिया आखिर मिलेगी कब? कृषि विभाग ने रबी सीजन के लिए बीकानेर जिले से कुल 80500 मैट्रिक टन यूरिया की डिमांड भेजी थी, लेकिन अब तक केवल 33000 एमटी की ही आपूर्ति मिल पाई है। दिसंबर माह की डिमांड 21500 एमटी थी, जबकि सप्लाई महज 6000 एमटी हुई है। ऐसे में किसान लाइन में लगते हैं, फार्म भरते हैं, आधार-जमाबंदी जमा करवाते हैं, लेकिन हाथ में बैग आ ही नहीं रहा। कई किसानों ने बताया कि उन्हें 90-100 बैग यूरिया चाहिए, लेकिन पांच बैग से ज्यादा नहीं मिल रहे। हालात यह हैं कि एक किसान परिवार को प्रति माह 50 बैग यूरिया का कोटा है, जिसकी सब्सिडी कीमत पर उन्हें करीब 1.25 लाख रुपए का लाभ मिलता है। किसानों की पीड़ा: 90 बैग चाहिए थे, मिले सिर्फ 5…कुछ जगहों पर कालाबाजारी भी चल रही यूरिया के साथ डीएपी की भी किल्लत, जमाखोरी शुरू ग्राउंड रिपोर्ट में यह सामने आया कि समस्या केवल कम सप्लाई तक सीमित नहीं है। कई किसान 25-30 किलो की जगह एक बीघा में 45 किलो तक यूरिया डाल रहे हैं। आगे सप्लाई न मिलने का डर, किसानों को यूरिया जमा करने के लिए प्रेरित कर रहा है। दिसंबर में यूरिया की कमी की वजह रैक देरी से मिलना बताया जा रहा है। नकली डीएपी का बंद होना भी लाइनों को बढ़ा रहा है, क्योंकि अब सभी किसान सहकारी समितियों पर निर्भर हैं। यह किल्लत प्राकृतिक नहीं, बल्कि प्रबंधन और व्यवहार दोनों की मिली जुली समस्या है। यूरिया के बैग से लंबी लाइन तक शनिवार दोपहर अनाज मंडी के सामने देर शाम तक शहरी और ग्रामीण एरिया की समितियों के बाहर लंबी कतारें दिखीं। किसानों के हाथ में टोकन, जेब में आधार कार्ड और दिमाग में एक ही सवाल, आज यूरिया मिलेगी या नहीं। एक किसान के माथे की सिलवटें साफ बता रही थीं कि यह खाद नहीं, बल्कि उनकी रबी सीजन की उम्मीदों का सवाल है।


