मप्र में अब बायो इकोनॉमी यानि प्रकृति, जैव संसाधन और बायोटेक्नोलॉजी आधारित सेक्टरों पर काम होगा। इसके लिए हाल ही में अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन एवं नीति विश्लेषण संस्थान को नोडल एजेंसी बनाकर एक्सीलेंस इन बायो-इकोनॉमी सेल की स्थापना की गई है। सेल में न केवल रिसर्च को बढ़ावा दिया जाएगा, बल्कि इंडस्ट्री के साथ मिलकर नए स्टार्ट अप भी शुरू किया जाएंगे। बायो इकोनॉमी का आकार 137 बिलियन डालर का इंडिया बायो इकोनॉमी रिपोर्ट 2023 के मुताबिक भारत में बायो इकोनॉमी यानि जैव अर्थव्यवस्था का आकार 137 बिलियन डॉलर का है। बड़े 7 राज्यों का हिस्सा 88% है, जबकि मप्र बाकी के 12% हिस्से में आता है। आंकड़ों के मुताबिक मप्र की हिस्सेदारी इसमें आधे प्रतिशत से भी कम है। अब लक्ष्य है कि अगले दो सालों में इस योगदान को बढ़ाया जाए। बायो इकोनॉमी का लक्ष्य प्रकृति का उपयोग करते हुए स्वच्छ, टिकाऊ और हाई-टेक अर्थव्यवस्था बनाना है। इसमें खेती, जैव कचरा, पौधे, बैक्टीरिया, जंगल आदि से नए उत्पाद-जैसे बायोफ्यूल, बायो-प्लास्टिक, दवाइयां-तैयार किए जाते हैं। प्रदेश में बायोफ्यूल, मिलेट-आधारित उद्योग, जैव उर्वरक और रिसर्च पार्क इसके बड़े केंद्र बन रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी। सीएम ने हाल ही में हैदराबाद में हुए निवेश कार्यक्रम में बायोटेक कंपनियों से सीधी बात करके मप्र आने का न्योता दिया था। रिसर्च, स्टार्टअप बढ़ेंगे बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी की प्रो. रागिनी गोथलवाल का कहना है कि नई शिक्षा नीति के तहत नए पाठ्यक्रम सिलेबस में लाने होंगे। बायोटेक पार्क के आने से भी रिसर्च, स्टार्ट अप बढ़ेंगे। मप्र में खाद्यान्न उत्पादन की ज्यादा क्षमता है। बायो फ्यूल, फार्मा जैसे नए सेक्टर में आर्थिक गतिविधियां बढ़ानी होंगी। प्रो. राजीव दीक्षित, वीसी, अटल बिहारी सुशासन संस्थान


