राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर ने बिजली कनेक्शन से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि बिजली कनेक्शन के लिए किसी भी व्यक्ति को सह-मालिकों की सहमति (NOC) या स्पष्ट स्वामित्व प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। जस्टिस डॉ. नूपुर भाटी की कोर्ट ने सोमवार को जोधपुर के शास्त्री नगर निवासी उषा कल्ला की याचिका पर सुनवाई के बाद जोधपुर डिस्कॉम को निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ता के घर में बिजली आपूर्ति बहाल करें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इंडियन इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 की धारा 43 के तहत मकान में रहने वाला व्यक्ति बिजली कनेक्शन का हकदार है। संपत्ति विवाद में खरीदारों के दबाव में काटा कनेक्शन!
याचिकाकर्ता उषा कल्ला साल 1999 से शास्त्री नगर स्थित मकान नंबर जी-100 में रह रही हैं। स्वर्गीय शंभू दत्त कल्ला के पास 1969 से इस मकान का पट्टा था और उन्होंने वर्ष 2019 में अपनी मृत्यु से पहले 14 सितंबर 2017 को वसीयत बनाकर संपत्ति अपनी पत्नी, याचिकाकर्ता और संतानों में बांटी थी। स्वर्गीय शंभूदत्त की पत्नी और दो बेटों ने कथित तौर पर बिना कानूनी बंटवारे के संपत्ति तीसरे पक्ष को बेच दी। इसके बाद 15 जुलाई 2025 को डिस्कॉम ने खरीदारों के दबाव में याचिकाकर्ता का बिजली कनेक्शन काट दिया। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि उनकी मुवक्किल मकान में शांतिपूर्वक रह रही थी, लेकिन विवाद के आधार पर 15 जुलाई को बिजली कनेक्शन काट दिया गया। कनेक्शन बहाल करने के लिए सभी औपचारिकताएं पूरी कीं, लेकिन डिस्कॉम ने 15 सितंबर के आदेश के माध्यम से आवेदन खारिज कर दिया। डिस्कॉम ने कहा था कि बिजली कनेक्शन के लिए याचिकाकर्ता को अन्य सह-मालिकों से एनओसी लेनी होगी। वकील ने तर्क दिया कि इंडियन इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 की धारा 43 के तहत मकान के मालिक या किरायेदार के आवेदन पर डिस्कॉम बिजली देने के लिए बाध्य है। उन्होंने कहा कि वर्तमान मामले में डिस्कॉम ने मनमाने आधार पर आवेदन खारिज किया है। सरकारी वकील का तर्क- सही तरीके से काटा कनेक्शन
दूसरी ओर, प्रतिवादी के वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि याचिकाकर्ता संपत्ति की निर्विवाद एकमात्र स्वामित्व या उसके किसी हिस्से को स्थापित करने के लिए कोई दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रही है। वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता ने न तो पंजीकृत सह-मालिकों से सहमति प्रस्तुत की है और न ही इस संबंध में सक्षम अदालत से आवश्यक निर्देश मांगे हैं। इन आधारों पर प्रतिवादी के वकील ने कहा कि डिस्कॉम ने सही तरीके से याचिकाकर्ता के परिसर का बिजली कनेक्शन काटा है। कोर्ट का विश्लेषण: किराएदार भी कर सकता है आवेदन
कोर्ट ने धारा 43 का विश्लेषण करते हुए कहा कि इस धारा के अनुसार बिजली आपूर्ति के लिए आवेदन मकान के मालिक या किरायेदार द्वारा किया जा सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता को पूरी संपत्ति या उसके किसी हिस्से के स्पष्ट और निर्विवाद एकमात्र स्वामित्व के दावे को स्थापित करने के लिए कोई दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने की जरुरत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को बिजली कनेक्शन सुरक्षित करने के उद्देश्य से पंजीकृत सह-मालिकों से सहमति प्रस्तुत करने या सक्षम अदालत से कोई निर्देश प्राप्त करने की भी जरुरत नहीं है। कानूनी और गैर-कानूनी किरायेदार में अंतर नहीं
कोर्ट ने कोलकाता हाईकोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि “इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 की धारा 43 कानूनी किरायेदार और गैर-कानूनी किरायेदार के बीच कोई अंतर नहीं करती है। एक बार जब व्यक्ति स्थायी कब्जे में पाया जाता है, तो वह अपने कब्जे वाले परिसर में बिजली की आपूर्ति का हकदार है। जब तक सिविल कोर्ट द्वारा बेदखली के आदेश द्वारा किरायेदार को बेदखल नहीं किया जाता है, उसे वैधानिक किरायेदार के रूप में ऐसी किरायेदारी से जुड़ी सुविधाओं और सुख-सुविधाओं का आनंद लेने का पूरा अधिकार है।” कोर्ट ने कहा कि उपरोक्त चर्चा के आधार पर प्रतिवादी याचिकाकर्ता को सह-मालिकों की स्पष्ट सहमति या सक्षम अदालत के आदेश/निर्देश प्रस्तुत करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते हैं, क्योंकि इंडियन इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 की धारा 43 ऐसा अनिवार्य नहीं करती है। कोर्ट ने 15 सितंबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए डिस्कॉम को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता के मकान नंबर जी-100, शास्त्री नगर, जोधपुर में बिजली आपूर्ति बहाल करें, बशर्ते याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत आवेदन धारा 43 के तहत अनिवार्य सभी पहलुओं में पूर्ण हो।


