शहरवासियों को नहीं मिल पाई सुविधाएं:872 करोड़ के फंड में 400 करोड़ से ज्यादा खर्च ट्रैफिक, पार्किंग तालाब और सौंदर्यीकरण पर, फिर भी स्मार्ट नहीं बन पाया शहर

स्मार्ट सिटी मिशन का मकसद था- शहर में स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और स्मार्ट सुविधाएं विकसित करना। इस मकसद को पूरा करने के लिए 10 साल में केंद्र और राज्य सरकार से मिले 872 करोड़ के फंड में से आधे से ज्यादा यानी करीब 400 करोड़ से अधिक का फंड केवल पार्किंग, ट्रांसपोर्ट, ट्रैफिक मैनेजमेंट, तालाबों बगीचों के संवर्धन व सौंदर्यीकरण पर खर्च करने के बावजूद रायपुर स्मार्ट सिटी नहीं बन सका। स्मार्ट सिटी के नाम पर शहरवासियों को जो सुविधाएं मिलनी थी, वो भी नहीं मिल पाई। भास्कर पड़ताल में पता चला है कि रायपुर स्मार्ट सिटी ने केंद्र व राज्य सरकार और पीपीपी मोड पर मिले फंड से ऐसे काम कर दिए, जो पहले से ही नगर निगम और दूसरी सरकारी एजेंसियां कर रही थीं। स्मार्ट सिटी के जितने बार प्रबंध निदेशक(एमडी) बदले, उतनी बार मूल प्लान में बदलाव कर दिया गया। अधिकारी सलाहकार समिति की सलाह की अनदेखी करते रहे। इसका नतीजा अब स्मार्ट सिटी के ज्यादातर प्रोजेक्ट बर्बादी की कगार पर आ गए हैं। दरअसल, 2015-16 में 2 करोड़ के अनुदान से शुरू हुआ रायपुर स्मार्ट सिटी का सफर 31 मार्च 2025 को खत्म हो जाएगा। स्मार्ट सिटी की थीम थी क्लीन और साफ सुथरा शहर, कनेक्टेड नेटवर्क विकास, शहर को निवेश के लिहाज से मुफीद बनाना। विजन था- मोर सुदृढ़, मोर घर, मोर जल, मोर उत्थान, मोर स्वास्थ्य, मोर मार्केट, मोर परिवहन। इसके तहत पार्किंग व्यवस्था में सुधार, कैमरों के जरिए ट्रैफिक निगरानी, बेतरतीब तारों के जंजाल से शहर को मुक्ति, स्मार्ट एजुकेशन, ट्रांसपोर्ट, नागरिक सुविधाएं, हेल्थ सुविधाएं, सड़कें, स्मार्ट पार्क, पब्लिक प्लेस और स्मार्ट ग्रीन बेल्ट आदि विकसित करना था। केंद्रीय शहरी मंत्रालय की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक रायपुर में 2024-25 वित्त वर्ष तक रायपुर स्मार्ट सिटी 342 प्रोजेक्ट के लिए 1733.94 करोड़ के फंड में से 332 कामों पर 1608.31 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। अभी 10 प्रोजेक्ट चल रहे हैं, जिनका बजट 125.6 करोड़ है। इसमें विभिन्न विभागों और अलग-अलग मदों से स्मार्ट सिटी के अंतर्गत हो रहे काम भी शामिल है।
770 एकड़ का कोर एरिया विकसित करने के लिए मिला
मिशन में 770 एकड़ की पुराने शहर की जमीन स्मार्ट बनाने के लिए मिली। इसक्षेत्र के लिए प्लान बनाकर काम करना था, पर ज्यादातर काम पैन सिटी के लिए चुन लिए। 872 करोड़ के फंड का 49.6% हिस्सा ट्रैफिक मैनेजमेंट, पार्किंग, ट्रांसपोर्ट जैसे कामों पर पैन सिटी के काम पर खर्च दिया। एबीडी एरिया ही सबसे ज्यादा बदहाल एबीडी एरिया में ही ट्रैफिक और पार्किंग की सबसे ज्यादा समस्या
200 करोड़ से अधिक का फंड केवल आईटीएमएस यानी इंटीग्रेडेट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम के लिए खर्च कर दिया। वहीं 38 करोड़ से अधिक दो मल्टीलेवल पार्किंग बनाने पर खर्च हुए। अंडरग्राउंड केबलिंग जैसे कामों के लिए करोड़ों फूंक दिए गए। बावजूद इसके जमीन पर क्षेत्र-आधारित विकास (एबीडी) एरिया में ट्रैफिक और ट्रांसपोर्ट व्यवस्था ही सुव्यवस्थित नहीं हो पाई है। स्मार्ट मोहल्ले में झूलते तारों से निजात नहीं मिल पाई
मोतीबाग और आसपास के इलाके को स्मार्ट मोहल्ला घोषित किया गया था। 3 साल बाद यहां नालियां गंदगी से पटी रहती हैं। स्मार्ट रोड के एबीडी प्लान में मोतीबाग इलाके का कोर एरिया भी शामिल है, लेकिन अब तक इसे झूलते तारों और ट्रांसफार्मर से आजादी नहीं मिली। नालियों के लिए स्मार्ट ड्रेनेज सिस्टम भी नहीं बन पाया। लोगों को सुविधाएं नहीं मिल पाईं। फंड का आधा हिस्सा ट्रैफिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम सुधारने में लगाया, पर फेल ही रहा; कोर एरिया की नालियों की समस्या जस की तस मनमानी: मूल प्लान में नहीं थे सफाई से जुड़े काम, 16% बजट इस पर खर्च रायपुर स्मार्ट सिटी ने मूल कामों से भटकते हुए ऐसे काम चुने, जिनके लिए नगर निगम पहले से ही काम कर रहा था। ऐसे में फंड का 16 फीसदी हिस्सा यानी 277 करोड़ रुपए तालाबों की सफाई, एसटीपी, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट, स्वच्छता मिशन के दौरान सौंदर्यीकरण के कामों पर खर्च कर दिए। 20 करोड़ के महाराज बंध, नरैया और खोखोपारा तालाब के एसटीपी का काम सात साल पहले निकाला था। इसके लिए एजेंसियां आती रही जाती रहीं, लेकिन अभी तक ये पूरा नहीं हो पाया। 43 से ज्यादा गार्डन संवारने का दावा भी किया जा रहा है, लेकिन ये काम भी पूरा नहीं हो पाया। जानकार कहते हैं कि तालाबों में एसटीपी का काम अमृत मिशन के तहत पहले ही चल रहा था। उसे स्मार्ट सिटी ने आखिर चुना ही क्यों? इसी तरह नगर निगम स्वच्छता में पहले ही से काम कर रहा था। ये भटकाव पैसे की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है। एक्सपर्ट व्यू- अतुल देशपांडे ,चेयरमैन ,आईआईआईडी प्लानिंग में वैकल्पिक मार्गों पर नहीं रखा ध्यान, इसी की कीमत चुका रहे
रायपुर शहर स्मार्ट नहीं बन पाया। इसकी मुख्य वजह प्लानिंग के स्तर पर हुई बड़ी खामियां है। जिन लोगों पर ये जिम्मेदारी थी। उन्होंने दूरदर्शिता का इस्तेमाल ही नहीं किया। फंड का एक बड़ा हिस्सा पब्लिक ट्रांसपोर्ट, पार्किंग, मोबिलिटी पर खर्च हुआ। लेकिन शहर में वैकल्पिक मार्गों पर ध्यान ही नहीं दिया गया। इसलिए भी हमारे शहर की यातायात व्यवस्था सुधर ही नहीं सकी। स्मार्ट सड़कें चौक-चौराहों की डिजाइनिंग में खामियां रही हैं। खासतौर पर शहर के एंट्री पॉइंट पर। किसी भी शहर का मुख्य चौराहा उसकी पहचान होता है। लेकिन हमारे यहां का मुख्य चौराहा घड़ी चौक ही सबसे ज्यादा बेतरतीब है। आईटीएमएस के कैमरे भी कहीं चालू हैं, कहीं बंद हैं। एक वक्त में सारे सिग्नल भी काम नहीं करते हैं। होना ये था लेकिन हुआ ये रायपुर स्मार्ट सिटी ने मूल प्लान के तहत प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाई। मूल रूप से ये पूरा प्लान 4 हजार करोड़ का था। इसमें केंद्र और राज्य के फंड के अलावा पीपीपी मोड से भी बहुत सारे काम किए जाने थे। केंद्र राज्य और पीपीपी मोड पर एक हजार करोड़ रुपए के शुरुआती निवेश के बाद, स्मार्ट सिटी को अपनी आय का स्रोत भी बनाना था। जो नहीं बन सका। लिहाजा स्मार्ट सिटी के 4 हजार करोड़ के मूल प्लान को भी घटाना पड़ गया, क्योंकि इसके लिए फंड मिलने की संभावनाएं ही नहीं बची। जब केंद्रीय शहरी मंत्रालय ने इसका रिव्यू किया तो 4 हजार करोड़ की स्मार्ट सिटी को डेढ़ से दो हजार करोड़ रुपए में ही समेट दिया। इसमें बीते दस साल में 332 कामों पर 16 सौ करोड़ से अधिक राशि खर्च हो चुकी है। जनता से सुझाव मांगने पर डेढ़ करोड़ खर्च किए जिम्मेदार ही नहीं जानते कि सुझावों का क्या हुआ स्मार्ट सिटी की खस्ता हालत के मद्देनजर चार साल पहले एक समीक्षा हुई थी। उस समीक्षा के बाद एक रिपोर्ट केंद्रीय शहरी मंत्रालय ने बनाई थी। उस रिपोर्ट के मुताबिक करीब डेढ़ करोड़ रुपए में राइजिंग रायपुर के नाम पर शहर को स्मार्ट बनाने के लिए आम लोगों से लेकर जानकारों तक से विचार मांगे गए थे। लेकिन इनमें से किन सुझावों पर काम हुआ, इसका ब्योरा तक नहीं है। मूल प्लान और हो रहे काम के बीच इसकी वजह से भारी अंतर आया, जिसका खमियाजा अब तक स्मार्ट सिटी को भुगतना पड़ रहा है। ​​​​​​​ अब कोई चारा नहीं रायपुर स्मार्ट सिटी के पास अब कोई फंड नहीं बचा है। वहीं प्रदेश में नगरीय निकायों के चुनाव भी होने वाले हैं। इस लिहाज से भी कोई नया काम नहीं चुना जा रहा है। जो प्रोजेक्ट लंबित हैं या जिन्हें ​मेंटेनेंस की आवश्यकता है, अब केवल उन्हीं पर फोकस किया जा रहा है। लेकिन फंड के अभाव में इन्हें पूरा कर पाना मुश्किल है।​​​​​​​ सुविधाएं विकसित की हैं, अब मेंटेनेंस है चुनौती
ये कहना सही नहीं होगा कि रायपुर स्मार्ट सिटी शहर में स्मार्ट सुविधाएं विकसित करने में असफल रहा। आईटीएमएस, नालंदा तक्षशिला लाइब्रेरी, तालाबों का संवर्धन, बगीचों का रीडेवलपमेंट जैसे कई ऐसे काम हैं, जिनसे शहरवासियों को सुविधाएं मिली हैं। हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि कोरोना काल में करीब दो से तीन साल प्रोजेक्ट समय पर नहीं हो पाए। उससे भी काफी हद तक जो नए काम होने थे, वो नहीं हो पाए।
अबिनाश मिश्रा, एमडी, स्मार्ट सिटी

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