फर्जी लेटर के आरोप लगाते हुए दायर शिकायत को खारिज किए जाने के खिलाफ लगी रिविजन पिटीशन पर चंडीगढ़ जिला अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि शिकायतकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि विवादित लेटर पर मौजूद शुरुआती हस्ताक्षर उसके नहीं हैं। इसी आधार पर अदालत ने 28 नवंबर 2018 को ट्रायल कोर्ट द्वारा की गई शिकायत खारिज करने की कार्रवाई को सही ठहराया और रिविजन पिटीशन को पूरी तरह खारिज कर दिया। आरोप-भ्रष्टाचार केस में फंसाने के लिए फर्जी लेटर बनाया शिकायतकर्ता लेकत अली पंजाब मंडी बोर्ड में सब-डिविजनल ऑफिसर थे। उन्होंने कोर्ट में दायर याचिका में आरोप लगाया था कि उन्हें भ्रष्टाचार के केस में फंसाने के लिए 30 दिसंबर 2011 का एक लेटर फर्जी तरीके से तैयार किया गया और कई दफ्तरों में उसकी गलत एंट्री दिखाई गई। शिकायतकर्ता का कहना था कि यह लेटर उन्होंने कभी लिखा या साइन नहीं किया। शिकायतकर्ता ने कई विभागीय कर्मचारियों को गवाह के रूप में पेश किया, जिन्होंने बताया कि लेटर की एंट्री उन्होंने अधिकारियों के कहने पर की थी। यह बात शिकायतकर्ता ने इसलिए कही है क्योंकि उनके अनुसार, उन पर दबाव बनाने के लिए यह पूरा मामला खड़ा किया गया। उनका कहना है कि उन्होंने एक चीफ इंजीनियर की वित्तीय गड़बड़ी की शिकायत की थी, और उसी का बदला लेने के लिए यह सब किया गया। नहीं कर पाया कोर्ट में साबित अदालत ने कहा कि गवाहों ने सिर्फ यह बताया कि एंट्री दबाव में करवाई गई थी, लेकिन किसी भी गवाह ने यह नहीं कहा कि लेटर पर जो शुरुआती सिग्नेचर हैं, वे शिकायतकर्ता के नहीं हैं। कोर्ट ने यह भी माना कि शिकायतकर्ता यह साबित नहीं कर पाया कि वह हमेशा पूरा सिग्नेचर ही करता था और कभी इनिशियल का इस्तेमाल नहीं करता था। इन्हीं कारणों के आधार पर अदालत ने रिविजन पिटीशन को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में फर्जीवाड़े का आरोप साबित नहीं होता। शिकायतकर्ता जिस एफआईआर को झूठा केस बता रहा है, अदालत को वह उसी शिकायत का जवाबी कदम लगता है। निचली अदालत का आदेश बरकरार कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने धारा 203 CRPC के तहत सही तरीके से शिकायत खारिज की थी, क्योंकि सबूत अपर्याप्त थे। इसलिए यह आदेश “न तो गलत है और न ही अवैध।” इसी के साथ रिविजन पिटीशन पूरी तरह खारिज कर दी गई।


